प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अबू धाबी यात्रा के दौरान भारत और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) ने रक्षा, ऊर्जा और शिपिंग से जुड़े कई महत्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर किए। ईरान से जुड़े बढ़ते क्षेत्रीय तनाव के बीच दोनों देश रणनीतिक सहयोग को और मजबूत करना चाहते हैं।
ये समझौते शुक्रवार को प्रधानमंत्री मोदी और यूएई के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान के बीच हुई बातचीत के दौरान अंतिम रूप दिए गए।
आधिकारिक बयान के अनुसार नई रणनीतिक रक्षा साझेदारी के तहत रक्षा निर्माण, उन्नत तकनीक, सैन्य प्रशिक्षण, समुद्री सुरक्षा, साइबर सुरक्षा, सुरक्षित संचार और खुफिया जानकारी साझा करने जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाया जाएगा।
दोनों देशों ने ऊर्जा क्षेत्र में भी कई अहम समझौते किए। इनमें रणनीतिक पेट्रोलियम भंडारण और तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) आपूर्ति से जुड़े प्रस्ताव शामिल हैं। एक प्रमुख योजना के तहत भारत के रणनीतिक तेल भंडार के लिए फुजैरा में कच्चे तेल के भंडारण की संभावना पर काम किया जाएगा।
यह दौरा ऐसे समय हुआ है जब हाल ही में यूएई ने ईरान पर फुजैरा अमीरात को निशाना बनाकर ड्रोन और मिसाइल हमले करने का आरोप लगाया था। अधिकारियों के अनुसार इन हमलों में एक तेल रिफाइनरी में आग लग गई थी और तीन भारतीय कर्मचारी घायल हुए थे।
प्रधानमंत्री मोदी ने बैठक के दौरान इन हमलों की कड़ी निंदा की और नागरिक बुनियादी ढांचे पर हुए हमलों के खिलाफ यूएई के प्रति भारत का समर्थन दोहराया।
यूएई में करीब 43 लाख भारतीय रहते हैं, जो दुनिया में सबसे बड़े प्रवासी भारतीय समुदायों में से एक है।
शेख मोहम्मद बिन जायद ने कहा कि मोदी के साथ ऊर्जा, तकनीक और आर्थिक निवेश समेत कई क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर चर्चा हुई।
व्यापक साझेदारी के तहत यूएई ने भारत के साथ आर्थिक संबंध मजबूत करने के लिए 5 अरब डॉलर तक निवेश करने की योजना का भी ऐलान किया।
ये समझौते ऐसे समय सामने आए हैं जब ईरान से जुड़े संघर्ष और होर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ते प्रतिबंधों के कारण वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ रही है। होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में से एक माना जाता है।
भारत अपनी लगभग 90 प्रतिशत तेल जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर है और उसका लगभग आधा आयातित तेल होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है।
क्षेत्रीय संकट और आपूर्ति बाधाओं के चलते भारत में ईंधन की कीमतों में पहले ही बढ़ोतरी देखी जा रही है, जबकि परिवहन लागत और सप्लाई को लेकर चिंताएं लगातार बनी हुई हैं।