Ganga River में औद्योगिक अपशिष्ट और प्रदूषण के स्तर में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है। ‘नमामि गंगे’ कार्यक्रम से जुड़े अधिकारियों के अनुसार वर्ष 2017 की तुलना में 2024 तक नदी में बहने वाले औद्योगिक अपशिष्ट में लगभग 60 प्रतिशत की कमी आई है। यह सुधार देश की सबसे बड़ी नदी संरक्षण पहल के तहत उठाए गए सख्त नियामकीय और तकनीकी कदमों का परिणाम माना जा रहा है।
अधिकारियों ने बताया कि अत्यधिक प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों से उत्पन्न जैविक ऑक्सीजन मांग (बीओडी) का भार 26 टन प्रति दिन से घटकर 2024 में 10.75 टन प्रति दिन रह गया है। बीओडी में यह गिरावट इस बात का संकेत है कि नदी में कार्बनिक प्रदूषण का स्तर पहले की तुलना में काफी कम हुआ है और जल की गुणवत्ता में सुधार देखा जा रहा है।
‘नमामि गंगे’ कार्यक्रम के तहत औद्योगिक इकाइयों पर निगरानी बढ़ाई गई है, और बिना उपचारित अपशिष्ट को सीधे नदी में छोड़ने पर सख्त कार्रवाई की जा रही है। इसके साथ ही कई जगहों पर आधुनिक शोधन संयंत्रों (ETPs) की स्थापना और पुराने संयंत्रों के उन्नयन पर जोर दिया गया है। अधिकारियों का कहना है कि डिजिटल मॉनिटरिंग सिस्टम और नियमित निरीक्षण ने भी प्रदूषण नियंत्रण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
सरकारी प्रयासों के साथ-साथ उद्योगों में पर्यावरणीय अनुपालन को लेकर जागरूकता भी बढ़ी है, जिससे अनुपचारित अपशिष्ट के उत्सर्जन में कमी आई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यही गति बनी रही तो आने वाले वर्षों में गंगा की जल गुणवत्ता में और सुधार संभव है।
हालांकि पर्यावरणविदों का यह भी कहना है कि अभी भी कई छोटे और मध्यम उद्योगों पर निगरानी बढ़ाने की आवश्यकता है ताकि प्रदूषण का शून्य स्तर प्राप्त किया जा सके। सरकार का लक्ष्य गंगा को स्वच्छ और अविरल बनाने की दिशा में निरंतर प्रयास जारी रखना है।