विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक 2026 में एक बार फिर दुनिया भर में मीडिया की आज़ादी को लेकर गंभीर चिंताएँ सामने आई हैं। यह सूचकांक अंतरराष्ट्रीय संस्था Reporters Without Borders (RSF) द्वारा जारी किया जाता है। इस वर्ष 180 देशों की सूची में नॉर्वे को लगातार दसवीं बार पहला स्थान प्राप्त हुआ है। नॉर्वे में पत्रकारों को स्वतंत्र रूप से कार्य करने का अधिकार, मजबूत कानूनी सुरक्षा और पारदर्शी शासन व्यवस्था उपलब्ध है। इसके कारण वहाँ मीडिया पर राजनीतिक दबाव बहुत कम माना जाता है। दूसरे स्थान पर एस्टोनिया और तीसरे स्थान पर नीदरलैंड रहे।
भारत की बात करें तो भारत को 2026 में 157वाँ स्थान मिला है। पिछले वर्ष भारत 151वें स्थान पर था, इसलिए इस बार भारत की रैंकिंग में गिरावट दर्ज हुई है। रिपोर्ट के अनुसार भारत में पत्रकारों पर बढ़ते हमले, डिजिटल निगरानी, मीडिया संस्थानों पर राजनीतिक प्रभाव तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर दबाव मुख्य कारण बताए गए हैं। कई पत्रकारों को कानूनी मामलों और धमकियों का सामना करना पड़ता है, जिससे स्वतंत्र पत्रकारिता प्रभावित होती है।
भारत के पड़ोसी देशों की स्थिति भी मिश्रित रही। नेपाल ने दक्षिण एशिया में सबसे बेहतर प्रदर्शन करते हुए लगभग 90वें स्थान के आसपास जगह बनाई। वहाँ लोकतांत्रिक सुधारों और अपेक्षाकृत खुले मीडिया वातावरण को सकारात्मक माना गया। श्रीलंका की स्थिति भारत से थोड़ी बेहतर रही, लेकिन आर्थिक और राजनीतिक संकटों का असर वहाँ की पत्रकारिता पर अभी भी दिखाई देता है।
पाकिस्तान की स्थिति भारत से भी खराब रही और वह निचले स्थानों में शामिल रहा। वहाँ पत्रकारों की सुरक्षा और सेंसरशिप को लेकर लगातार अंतरराष्ट्रीय चिंता बनी हुई है। बांग्लादेश में भी डिजिटल सुरक्षा कानूनों के कारण मीडिया स्वतंत्रता पर सवाल उठे हैं। चीन विश्व के सबसे नीचे देशों में शामिल रहा, जहाँ सरकार का मीडिया पर कड़ा नियंत्रण माना जाता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए प्रेस की स्वतंत्रता अत्यंत आवश्यक है। स्वतंत्र मीडिया जनता तक सही जानकारी पहुँचाने, भ्रष्टाचार उजागर करने और सरकार की जवाबदेही तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। भारत सहित दक्षिण एशियाई देशों को पत्रकारों की सुरक्षा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को और मजबूत करने की आवश्यकता है।
पहले स्थान पर कौन