अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच जारी नाजुक युद्धविराम पर एक बार फिर संकट गहरा गया है, जब अफगानिस्तान के पूर्वी कुनार प्रांत में हुए घातक हमले ने हालात को और बिगाड़ दिया। तालिबान अधिकारियों के मुताबिक, मोर्टार और मिसाइल हमलों में एक यूनिवर्सिटी और आसपास के रिहायशी इलाकों को निशाना बनाया गया, जिसमें कम से कम सात लोगों की मौत हो गई और 80 से अधिक घायल हो गए।
अफगान अधिकारियों के अनुसार, हमले प्रांतीय राजधानी असदाबाद और आसपास के जिलों में हुए। उच्च शिक्षा मंत्रालय ने बताया कि घायलों में करीब 30 छात्र और प्रोफेसर शामिल हैं, जबकि सैयद जमालुद्दीन अफगानी यूनिवर्सिटी को भारी नुकसान पहुंचा है। तालिबान प्रवक्ता हम्दुल्लाह फिटरत ने इस घटना को नागरिकों और शैक्षणिक संस्थानों के खिलाफ “माफ न करने योग्य युद्ध अपराध” बताया।
वहीं पाकिस्तान ने इन आरोपों को सख्ती से खारिज किया है। उसने यूनिवर्सिटी को निशाना बनाने के दावों को “झूठा” बताया और कहा कि उसकी सैन्य कार्रवाई सटीक और खुफिया जानकारी पर आधारित होती है। हालांकि, पाकिस्तान ने अफगान क्षेत्र में किसी भी गतिविधि से पूरी तरह इनकार नहीं किया।
दोनों पक्षों ने यह भी स्वीकार किया है कि औपचारिक युद्धविराम के बावजूद सीमा पार गोलीबारी जारी है। कुनार की घटना को लेकर अलग-अलग दावों ने इस आशंका को बढ़ा दिया है कि यह युद्धविराम पूरी तरह टूट सकता है।
यह तनाव ऐसे समय में बढ़ा है जब हाल ही में चीन के उरुमकी में दोनों देशों के बीच शांति वार्ता हुई थी। हालांकि बातचीत को सकारात्मक बताया गया, लेकिन कोई ठोस समझौता सामने नहीं आया। विशेषज्ञों का कहना है कि दोनों देशों के बीच गहरे मतभेद अब भी बने हुए हैं।
इस संघर्ष की जड़ में पाकिस्तान का यह आरोप है कि अफगानिस्तान तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) को पनाह दे रहा है। काबुल इन आरोपों से इनकार करता है और कहता है कि पाकिस्तान इन्हें सीमा पार सैन्य कार्रवाई को सही ठहराने के लिए इस्तेमाल करता है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, भरोसे की कमी और अलग-अलग दृष्टिकोण के कारण बातचीत आगे नहीं बढ़ पा रही है। पाकिस्तान जहां ठोस गारंटी चाहता है, वहीं अफगानिस्तान इन शर्तों को पूरी तरह स्वीकार करने में हिचक रहा है।
पहले भी कई युद्धविराम समझौते विफल हो चुके हैं। धार्मिक त्योहारों के दौरान घोषित अस्थायी संघर्षविराम भी ज्यादा समय तक नहीं टिक पाए। मार्च में काबुल में हुआ एक बड़ा हमला भी विवाद का कारण बना था, जिसमें दोनों पक्षों के दावे अलग-अलग थे।
चीन, कतर, सऊदी अरब और तुर्किये जैसे देश मध्यस्थता की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन अब तक कोई स्थायी समाधान नहीं निकल पाया है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक ठोस और लागू करने योग्य समझौते नहीं होते, तब तक शांति संभव नहीं है।
अफगानिस्तान ने मानवीय और आर्थिक मुद्दों पर भी चिंता जताई है, जैसे सीमा खोलना, व्यापार बहाल करना और पाकिस्तान में रह रहे अफगान शरणार्थियों की स्थिति में सुधार। वहीं पाकिस्तान का कहना है कि पहले सुरक्षा चिंताओं का समाधान जरूरी है।
बढ़ते तनाव और कम भरोसे के बीच विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि अगर ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह युद्धविराम ज्यादा समय तक नहीं टिक पाएगा।