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अल्पसंख्यकों पर बढ़ते सवालों के बीच RSS का वैश्विक अभियान शुरू

भारत के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने अमेरिका और यूरोप में अपना वैश्विक संपर्क अभियान शुरू किया है। यह पहल ऐसे समय में सामने आई है जब भारत में अल्पसंख्यकों के अधिकारों, हेट स्पीच और हिंसा को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सवाल बढ़ रहे हैं।

RSS, जिसे भारतीय जनता पार्टी (BJP) का वैचारिक संगठन माना जाता है, ने कहा कि इस अभियान का उद्देश्य संगठन को लेकर फैली “गलतफहमियों” को दूर करना है।

RSS महासचिव दत्तात्रेय होसबाले ने हाल ही में अमेरिका, ब्रिटेन और जर्मनी जैसे देशों का दौरा किया। इस दौरान उन्होंने शिक्षाविदों, नीति विशेषज्ञों, कारोबारियों और भारतीय प्रवासी समुदाय के लोगों से मुलाकात की।

नई दिल्ली में मीडिया से बातचीत करते हुए होसबाले ने उन आरोपों को खारिज किया जिनमें RSS पर हिंदू वर्चस्ववाद फैलाने और अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव करने का आरोप लगाया जाता है। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर RSS की छवि को गलत तरीके से पेश किया जा रहा है और “हकीकत इससे बिल्कुल अलग है।”

RSS की स्थापना 1925 में नागपुर में केशव बलिराम हेडगेवार ने की थी। संगठन खुद को एक सांस्कृतिक और सभ्यतागत हिंदू आंदोलन बताता है। हालांकि आलोचक RSS पर हिंदुत्व की विचारधारा को बढ़ावा देने का आरोप लगाते हैं, जिसका उद्देश्य भारत को एक हिंदू राष्ट्र के रूप में स्थापित करना बताया जाता है।

RSS और BJP के बीच लंबे समय से करीबी संबंध रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी 1970 के दशक से RSS से जुड़े रहे हैं।

यह अभियान ऐसे समय में शुरू हुआ है जब अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों और शोध संस्थानों ने भारत में मुसलमानों और ईसाइयों के खिलाफ बढ़ती नफरत, हिंसा और भेदभाव को लेकर चिंता जताई है। कई रिपोर्टों में हेट स्पीच, मॉब लिंचिंग, चर्चों पर हमलों और अल्पसंख्यकों के खिलाफ भेदभाव के मामलों में बढ़ोतरी का दावा किया गया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि RSS अपनी अंतरराष्ट्रीय छवि को सुधारने की कोशिश कर रहा है, खासकर तब जब अमेरिका की एक संघीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग ने भारत में धार्मिक आजादी को लेकर चिंता जताई थी और RSS व उसके कुछ नेताओं पर प्रतिबंध लगाने की सिफारिश की थी।

विश्लेषकों के अनुसार पश्चिमी देशों में भारतीय प्रवासी समुदाय की बढ़ती आर्थिक और राजनीतिक ताकत के कारण RSS की वैश्विक छवि अब पहले से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गई है। कई पर्यवेक्षकों का मानना है कि प्रवासी समुदाय का समर्थन लंबे समय से RSS से जुड़े अभियानों को मजबूत करता रहा है।

होसबाले की हालिया बैठकों में वॉशिंगटन, लंदन और बर्लिन के थिंक टैंक, सांसद और नीति संस्थान शामिल रहे। RSS के मुताबिक इन चर्चाओं में भारत के सामाजिक विकास, सांस्कृतिक पहचान और वैश्विक साझेदारी जैसे मुद्दों पर बात हुई।

हालांकि आलोचकों ने इस पूरे अभियान को “डैमेज कंट्रोल” बताया है और कहा है कि यह अल्पसंख्यकों के मुद्दों पर बढ़ती अंतरराष्ट्रीय आलोचना को कम करने की कोशिश है।

RSS पर भारत में पहले भी प्रतिबंध लग चुके हैं, जिनमें 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के बाद लगाया गया प्रतिबंध भी शामिल है। गांधी की हत्या करने वाले नाथूराम गोडसे का संबंध पहले RSS से रहा था। हालांकि संगठन हमेशा हिंसा में किसी भी भूमिका से इनकार करता आया है और खुद को राष्ट्रीय एकता व सांस्कृतिक विकास के लिए काम करने वाला संगठन बताता है।

भारत और विदेशों में RSS की भूमिका को लेकर बहस अब भी बेहद विवादित और राजनीतिक रूप से संवेदनशील बनी हुई है।