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गेहूं-प्याज के दाम उछले, कच्चे तेल ने भी बढ़ाई चिंता; भारत में महंगाई का दबाव बढ़ा

 

नई दिल्ली, 20 अगस्त 2026: भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में राहत की उम्मीद फिलहाल कमजोर पड़ती दिख रही है। अमेरिका-ईरान के बीच बढ़ते तनाव और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर अनिश्चितता ने अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में फिर बेचैनी बढ़ा दी है। इसका असर सिर्फ कच्चे तेल पर ही नहीं, बल्कि खाने-पीने की जरूरी चीजों की कीमतों पर भी दिखाई देने लगा है।

कच्चे तेल में फिर तेजी

अमेरिका और ईरान के बीच किसी नए समझौते की उम्मीद कमजोर होने के बाद कच्चे तेल की कीमतों में तेजी देखी गई। 18 अगस्त को ब्रेंट क्रूड करीब 91 डॉलर प्रति बैरल पर बंद हुआ, जबकि WTI करीब 85 डॉलर पर पहुंच गया। बाजार में आशंका है कि भू-राजनीतिक तनाव लंबा खिंचने पर तेल की कीमतें और ऊपर जा सकती हैं। 

भारत के लिए महंगा कच्चा तेल चिंता की बात है क्योंकि देश अपनी जरूरत का 85 फीसदी से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है। तेल महंगा होने पर परिवहन और लॉजिस्टिक्स की लागत बढ़ सकती है, जिसका असर धीरे-धीरे आम लोगों की जेब पर पड़ सकता है। 

गेहूं की कीमतों में भी उछाल

महंगाई का दबाव सिर्फ ईंधन तक सीमित नहीं है। गेहूं की कीमतों में भी तेजी देखने को मिल रही है। रूस-यूक्रेन तनाव के कारण काला सागर क्षेत्र से गेहूं की सप्लाई को लेकर चिंता बनी हुई है। भारतीय मंडियों में भी गेहूं के भाव में पिछले एक महीने में करीब 4 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इसका असर आटा, ब्रेड और गेहूं से बने दूसरे खाद्य उत्पादों की लागत पर पड़ सकता है। 

प्याज भी हुआ महंगा

रसोई के बजट पर प्याज की बढ़ती कीमतों ने भी दबाव बढ़ाया है। प्याज का औसत खुदरा भाव बढ़कर करीब ₹37.20 प्रति किलो हो गया है, जो एक महीने पहले ₹34.53 और एक साल पहले ₹26.86 प्रति किलो था। खरीफ प्याज की आवक में देरी को कीमतों में तेजी की प्रमुख वजह बताया जा रहा है। 

एक ही वजह से बढ़ रही चिंता

कच्चे तेल से लेकर गेहूं और प्याज तक, अलग-अलग बाजारों में बढ़ती कीमतों के पीछे सप्लाई और भू-राजनीतिक तनाव अहम भूमिका निभा रहे हैं। मिडिल ईस्ट में तनाव बढ़ने से ऊर्जा आपूर्ति पर खतरा बढ़ता है, जबकि रूस-यूक्रेन तनाव से कृषि जिंसों की सप्लाई प्रभावित होने की आशंका रहती है।

ऐसे में आने वाले दिनों में दो चीजों पर सबसे ज्यादा नजर रहेगीहोर्मुज से जुड़ा तेल संकट और काला सागर क्षेत्र की खाद्य सप्लाई। अगर दोनों मोर्चों पर तनाव बना रहता है तो पेट्रोल-डीजल से लेकर रसोई के सामान तक आम आदमी के बजट पर दबाव बढ़ सकता है।