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विशेष ग्राउंड रिपोर्ट: कूनो के जंगलों में मिशन चीता के रक्षक; जान जोखिम में डालकर 49 चीतों के पीछे भाग रही है यह गुमनाम फौज

 

कूनो नेशनल पार्क (मध्य प्रदेश): जब देश 'प्रोजेक्ट चीता' की सफलता और शावकों (Cubs) के जन्म का जश्न मना रहा होता है, तब कैमरे की चकाचौंध से कोसों दूर, मध्य प्रदेश के श्योपुर जिले में स्थित कूनो नेशनल पार्क के घने जंगलों में इतिहास लिखने वाली एक गुमनाम टीम मौत से जूझ रही होती है। कूनो में वर्तमान में 24 वयस्क चीतों और 25 शावकों (कुल 49 चीतों) की सुरक्षा, सेहत और पल-पल की मूवमेंट पर नजर रखने के लिए एक विशेष फील्ड और ट्रैकिंग टीम 24 घंटे मुस्तैद है। 45 डिग्री की झुलसाने वाली गर्मी, मानसून में उफनती नदियां और जहरीले सांपों के बीच काम करने वाले इन जांबाजों की कहानी किसी रोमांचक फिल्म से कम नहीं है।

45 डिग्री की 'भट्टी' और थर्मामीटर जैसी जिंदगी

मई और जून के महीनों में जब कूनो का तापमान 45 से 47 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है और लू के थपेड़े चलते हैं, तब यह ट्रैकिंग टीम भारी-भरकम एंटीना और रिसीवर लेकर पैदल ही पत्थरों और कटीली झाड़ियों के बीच चलती है। चीतों के शरीर पर लगे वीएचएफ (VHF) और सैटेलाइट जीपीएस कॉलर आईडी से आने वाले सिग्नल को पकड़ने के लिए टीम को खुले मैदानों और ऊंची पहाड़ियों पर घंटों खड़ा रहना पड़ता है। इस झुलसाने वाली गर्मी में जरा सी लापरवाही किसी चीते के लिए जानलेवा साबित हो सकती है, क्योंकि अत्यधिक गर्मी के कारण चीतों में डिहाइड्रेशन या घावों में कीड़े (Maggots) पड़ने का खतरा सबसे ज्यादा होता है।

उफनती नदियां और मगरमच्छों का पहरा

मानसून के आते ही कूनो की चुनौतियां दोगुनी हो जाती हैं। कूनो नदी और उसके सहायक नाले उफान पर आ जाते हैं, जिससे जंगल के कई हिस्से मुख्य मुख्यालय से पूरी तरह कट जाते हैं। ऐसे समय में, जब कोई चीता उफनती नदी पार कर बस्तियों की तरफ भागता है, तो यह टीम अपनी जान हथेली पर रखकर, उफनते नालों को तैरकर या रस्सियों के सहारे पार करती है। इस इलाके में जहरीले कोबरा, रसेल वाइपर और नदी में मौजूद मगरमच्छों का डर हमेशा बना रहता है, लेकिन टीम का एकमात्र लक्ष्य चीते की लोकेशन को मिस न होने देना होता है।

कैसे होती है 49 चीतों की अचूक निगरानी?

निगरानी के काम को पुख्ता करने के लिए कूनो प्रशासन ने एक त्रि-स्तरीय (3-Layer) सुरक्षा और ट्रैकिंग चक्र तैयार किया है:

  1. सैटेलाइट और वीएचएफ ट्रैकिंग: हर वयस्क चीते के गले में एक विशेष कॉलर फिट है। सैटेलाइट हर कुछ घंटों में उनकी लोकेशन का डेटा बेस स्टेशन भेजता है। इसके अलावा, ग्राउंड टीम 'वेरी हाई फ्रीक्वेंसी' (VHF) डायरेक्शनल एंटीना के जरिए चीतों की लाइव दिशा और दूरी का पता लगाती है।
  2. समर्पित चीता ट्रैकर (Cheetah Trackers): कूनो को अलग-अलग ब्लॉकों में बांटा गया है। हर एक चीते की कस्टडी 2 से 3 समर्पित ट्रैकर्स (वन रक्षकों और स्थानीय कैम्प फॉलोअर्स) के पास होती है। इनका काम रोजाना सुबह-शाम चीते को अपनी आंखों से देखना (Visual Sighting) और उसके शिकार (Kill) करने के पैटर्न को नोट करना है।
  3. ड्रोन और डॉग स्क्वायड: घने जंगलों या बीहड़ों में जहां इंसानों का पहुंचना नामुमकिन होता है, वहां थर्मल कैमरों से लैस ड्रोनों की मदद ली जाती है। साथ ही शिकारी और घुसपैठियों को रोकने के लिए विशेष रूप से प्रशिक्षित जर्मन शेफर्ड 'डॉग स्क्वायड' लगातार गश्त करता है।

 स्थानीय आदिवासियों का सहारा: 'चीता मित्र'

इस गुमनाम टीम में वन विभाग के अधिकारियों के अलावा सबसे बड़ी भूमिका स्थानीय 'सहरिया' आदिवासी युवाओं की है। इन्हें 'चीता मित्र' बनाया गया है। जंगली रास्तों की अचूक समझ और चीतों के व्यवहार को भांपने की इनकी कला अद्भुत है। जब कोई चीता कूनो की सीमा लांघकर उत्तर प्रदेश या राजस्थान के जंगलों की तरफ रुख करता है, तो यही स्थानीय ट्रैकर बिना सोए लगातार 48-48 घंटे तक चीते के पीछे-पीछे दौड़ते हैं ताकि उसे सुरक्षित वापस लाया जा सके या ग्रामीणों से उसका टकराव रोका जा सके।

कूनो नेशनल पार्क के डायरेक्टर के अनुसार, "प्रोजेक्ट चीता की रीढ़ की हड्डी ये वनकर्मी और ट्रैकर्स ही हैं। कैमरे पर भले ही बड़े विशेषज्ञ दिखते हों, लेकिन जमीन पर चीतों को जिंदा रखने का श्रेय इन्हीं गुमनाम नायकों के पसीने और संघर्ष को जाता है।