नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने सार्वजनिक स्थानों पर पोर्नोग्राफी देखने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह विषय न्यायिक हस्तक्षेप से अधिक नीति निर्माण का मामला है और इस पर निर्णय लेना केंद्र सरकार तथा संबंधित विषय विशेषज्ञों का अधिकार क्षेत्र है।
सुनवाई के दौरान सर्वोच्च अदालत ने कहा कि ऐसे मुद्दों पर कानून बनाने या नीतिगत निर्णय लेने की जिम्मेदारी संसद और कार्यपालिका की है। न्यायालय ने यह भी माना कि इस विषय में सामाजिक, तकनीकी और कानूनी पहलुओं पर व्यापक विचार-विमर्श की आवश्यकता है, जिसे सरकार और विशेषज्ञ संस्थाएं बेहतर तरीके से कर सकती हैं।
याचिकाकर्ता ने अदालत से सार्वजनिक स्थानों पर अश्लील सामग्री देखने पर रोक लगाने और इसके लिए सख्त दिशा-निर्देश जारी करने की मांग की थी। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस मांग पर कोई निर्देश जारी करने से इनकार करते हुए कहा कि यह मामला नीति निर्माण से जुड़ा है और अदालत इसमें हस्तक्षेप नहीं करेगी।
इस फैसले के बाद अब इस विषय पर आगे की कार्रवाई का दायित्व केंद्र सरकार पर रहेगा। यदि सरकार आवश्यक समझे तो वह विशेषज्ञों की राय लेकर इस संबंध में नई नीति या कानून बनाने पर विचार कर सकती है।