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कार्यकाल खत्म, फिर भी कुर्सी बरकरार? ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाने पर हाई कोर्ट ने यूपी सरकार से पूछे अहम सवाल


लखनऊ: उत्तर प्रदेश में ग्राम पंचायतों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद ग्राम प्रधानों को प्रशासक नियुक्त किए जाने के फैसले पर इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने गंभीर सवाल उठाए हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह मामला केवल प्रशासनिक व्यवस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे जुड़े महत्वपूर्ण संवैधानिक पहलुओं की भी गहन समीक्षा आवश्यक है।

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने राज्य सरकार से पूछा कि पंचायतों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद पूर्व ग्राम प्रधानों को प्रशासक नियुक्त करने का कानूनी और संवैधानिक आधार क्या है। अदालत ने संकेत दिया कि स्थानीय स्वशासन से जुड़े मामलों में संविधान के प्रावधानों और लोकतांत्रिक व्यवस्था की भावना को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

याचिका में इस नियुक्ति प्रक्रिया को चुनौती देते हुए तर्क दिया गया है कि कार्यकाल समाप्त होने के बाद निर्वाचित प्रतिनिधियों को प्रशासक के रूप में बनाए रखना संविधान और पंचायत राज व्यवस्था की मूल भावना के विपरीत हो सकता है। इस पर हाई कोर्ट ने राज्य सरकार से विस्तृत जवाब दाखिल करने को कहा है।

कोर्ट ने यह भी कहा कि मामले में उठाए गए प्रश्न व्यापक जनहित और स्थानीय लोकतंत्र से जुड़े हैं। इसलिए केवल प्रशासनिक सुविधा के आधार पर निर्णय नहीं लिया जा सकता। अदालत ने सरकार से संबंधित नियमों और कानूनी प्रावधानों का स्पष्ट विवरण प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं।

अब इस मामले में राज्य सरकार के जवाब और अदालत की आगामी सुनवाई पर सभी की नजरें टिकी हैं, क्योंकि इसका प्रभाव प्रदेश की ग्राम पंचायतों की प्रशासनिक व्यवस्था और भविष्य की पंचायत चुनाव प्रक्रिया पर पड़ सकता है।