लखनऊ: उत्तर प्रदेश में बाघ संरक्षण के प्रयासों का सकारात्मक असर साफ दिखाई दे रहा है। वर्ष 2006 में राज्य में जहां बाघों की संख्या 109 थी, वहीं वर्ष 2022 तक यह बढ़कर 205 हो गई। यानी करीब 16 वर्षों में बाघों की आबादी लगभग दोगुनी हो गई है।
राज्य के पीलीभीत, लखीमपुर खीरी, सीतापुर और बहराइच जैसे वन क्षेत्रों में लगातार संरक्षण और निगरानी की बदौलत यह उपलब्धि हासिल हुई है। इन इलाकों में वन विभाग की टीमें नियमित गश्त, निगरानी और वन्यजीव संरक्षण के कार्यों में जुटी रहती हैं।
वन विभाग के सामने सबसे बड़ी चुनौती तब होती है, जब कोई बाघ मानव बस्तियों की ओर रुख कर देता है या आदमखोर घोषित किया जाता है। ऐसे मामलों में विभाग कार्रवाई जरूर करता है, लेकिन इस दौरान यह भी सुनिश्चित किया जाता है कि अन्य बाघों और उनके प्राकृतिक आवास पर कोई प्रतिकूल प्रभाव न पड़े। जरूरत पड़ने पर रेस्क्यू, ट्रैंक्विलाइजेशन और सुरक्षित स्थान पर स्थानांतरण जैसे उपाय अपनाए जाते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि बाघों की बढ़ती संख्या केवल संरक्षण कार्यक्रमों का परिणाम नहीं है, बल्कि जंगलों की सुरक्षा, अवैध कटान पर सख्ती, शिकार पर नियंत्रण और वन्यजीवों के अनुकूल वातावरण बनाए रखने की नीतियों का भी महत्वपूर्ण योगदान है।
उत्तर प्रदेश में बाघों की बढ़ती संख्या इस बात का संकेत है कि यदि संरक्षण, निगरानी और वन प्रबंधन की योजनाओं को प्रभावी ढंग से लागू किया जाए, तो वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में उल्लेखनीय सफलता हासिल की जा सकती है।