पुरी: ओडिशा के पुरी में निकलने वाली भगवान जगन्नाथ की भव्य रथ यात्रा दुनियाभर में प्रसिद्ध है। हर साल लाखों श्रद्धालु इस दिव्य उत्सव में शामिल होकर भगवान के रथ को खींचने का सौभाग्य प्राप्त करते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि रथ को खींचने वाली रस्सियों को लेकर भी एक बेहद रोचक पौराणिक कथा प्रचलित है? मान्यता है कि इन रस्सियों का संबंध एक राक्षस से जुड़ा हुआ है।
पौराणिक कथा के अनुसार, शंखचूड़ नाम का एक शक्तिशाली दैत्य था। उसने कठोर तपस्या कर कई दिव्य वरदान प्राप्त किए थे, जिसके कारण उसे पराजित करना लगभग असंभव हो गया था। बाद में भगवान विष्णु और भगवान शिव की लीला से उसका अंत हुआ। कहा जाता है कि मृत्यु के समय शंखचूड़ ने भगवान से प्रार्थना की कि उसका जीवन किसी पवित्र कार्य में सफल हो जाए।
मान्यता है कि भगवान ने उसे आशीर्वाद दिया कि वह सदैव उनकी सेवा में रहेगा। इसी कारण लोककथाओं में कहा जाता है कि भगवान जगन्नाथ के रथ को खींचने वाली पवित्र रस्सियों को 'शंखचूड़ रस्सी' कहा जाता है। यह कथा इस बात का प्रतीक है कि ईश्वर की कृपा से सबसे बड़ा पापी भी सेवा और भक्ति के मार्ग पर चल सकता है।
हालांकि, यह स्पष्ट करना जरूरी है कि यह एक पौराणिक मान्यता है। वास्तविक रूप से रथ की रस्सियां मजबूत प्राकृतिक रेशों से तैयार की जाती हैं। फिर भी श्रद्धालुओं के बीच शंखचूड़ की यह कथा आज भी गहरी आस्था और विश्वास के साथ सुनाई जाती है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, रथ की रस्सी को छूना या उसे खींचना बेहद शुभ माना जाता है। ऐसा विश्वास है कि इससे व्यक्ति के जीवन के कष्ट दूर होते हैं और भगवान जगन्नाथ की विशेष कृपा प्राप्त होती है। यही वजह है कि रथ यात्रा के दौरान हजारों लोग रस्सी पकड़कर रथ खींचने के लिए उत्सुक रहते हैं।
भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा और संस्कृति का अनोखा संगम है। रथ की रस्सियों से जुड़ी शंखचूड़ की यह कथा इस महापर्व को और भी रहस्यमय और रोचक बना देती है। चाहे इसे आस्था मानें या लोककथा, यह कहानी सदियों से श्रद्धालुओं के मन में भगवान के प्रति विश्वास और भक्ति को और अधिक मजबूत करती आ रही है।