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पंचायत चुनाव पर सत्ता-विपक्ष की चुप्पी: क्या विधानसभा चुनाव से पहले सभी को था डर?

उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव को लेकर आखिरकार जो फैसला सामने आया, उसने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब सरकार ने पंचायत चुनाव टालने या न कराने का संकेत दिया, तब विपक्ष की किसी बड़ी पार्टी ने खुलकर विरोध क्यों नहीं किया? न कोई बड़ा आंदोलन हुआ, न प्रेस कॉन्फ्रेंस और न ही किसी दल ने इस फैसले के खिलाफ निंदा प्रस्ताव पारित किया। इससे यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या सत्ता और विपक्ष दोनों ही विधानसभा चुनाव से पहले पंचायत चुनाव नहीं चाहते थे।

पंचायती राज मंत्री पिछले तीन महीनों से लगातार बयान दे रहे थे कि चुनाव की तैयारियां चल रही हैं। कभी मतदाता सूची के पुनरीक्षण की बात कही गई, कभी आरक्षण प्रक्रिया को वजह बताया गया, तो कभी प्रशासनिक तैयारियों का हवाला दिया गया। गांव-गांव में लोग यह मानकर चल रहे थे कि जल्द ही पंचायत चुनाव की तारीखों का ऐलान होगा। लेकिन अचानक सरकार की तरफ से यह कह दिया गया कि पंचायत चुनाव न कराने को मंजूरी मिल गई है।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि पंचायत चुनाव सीधे तौर पर गांव की राजनीतिक हवा का संकेत देते हैं। ऐसे में विधानसभा चुनाव से पहले अगर पंचायत चुनाव होते, तो उसका असर बड़े चुनाव पर भी पड़ सकता था। शायद यही वजह रही कि विपक्ष भी इस मुद्दे पर ज्यादा आक्रामक नहीं दिखा।

अब सवाल यह है कि क्या लोकतंत्र में स्थानीय निकाय चुनावों को लगातार टालना सही संदेश देता है? गांव की सरकार का चुनाव समय पर होना चाहिए या राजनीतिक समीकरणों के हिसाब से फैसला लिया जाना चाहिए? यही बहस अब प्रदेश की राजनीति में तेज होती दिखाई दे रही है।

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BY Himanshu Dubey ·