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दिल्ली के त्रिनगर का सच: 'लैंड जिहाद' का हौवा और मुस्लिमों का घेट्टोइज़ेशन

आजकल दिल्ली के त्रिनगर इलाके की कुछ तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर बहुत चर्चा में हैं। इन वीडियो में सुअर पालने और उन्हें एक खास धार्मिक प्रतीक के रूप में दिखाने की कोशिशें नजर आती हैं। बाहर से देखने वालों के लिए यह शायद सिर्फ एक साधारण झगड़ा, दो पड़ोसियों की आपसी रंजिश या किसी की निजी आस्था का हिस्सा हो सकती है, लेकिन अगर इसकी गहराई में जाकर देखें, तो इसके पीछे की कड़वी सच्चाई वह साम्प्रदायिक घेराबंदी है, जो भारतीय शहरों में अल्पसंख्यकों के खिलाफ एक खतरनाक और सोचे-समझे तरीके (Pattern) के रूप में सामने आ रही है। मैं अमान अली हूँ और पिछले बीस सालों से त्रिनगर में अपने परिवार के साथ रह रहा हूँ। जो कुछ भी आज चर्चा का विषय बना हुआ है, उसका सीधा असर मेरे और मेरे जैसे उन परिवारों की जिंदगी पर पड़ा है, जो धीरे-धीरे अपने ही पड़ोस में पराये और असुरक्षित किए जा रहे हैं। यह कोई अचानक हुई घटना नहीं है, बल्कि पिछले एक साल से हमें मानसिक, सामाजिक और कानूनी रूप से परेशान करने की एक सोची-समझी साजिश का हिस्सा है। इस पूरी कड़वाहट की शुरुआत पिछले साल रमजान के महीने में हुई थी, जब घर के अंदर शांति से नमाज पढ़ने के दौरान बाहर कुछ लोगों ने नारेबाजी और वीडियो बनाने का सिलसिला शुरू किया।

उस दिन पहली बार यह अहसास हुआ कि अब निजी और मजहबी दायरों के बीच की सुरक्षा दीवारें टूट रही हैं और हमारी पहचान को एक जुर्म की तरह पेश किया जा रहा है। यह परेशानी जल्द ही एक व्यवस्थित और कानूनी रूप लेने लगी। हमारे पड़ोस में रहने वाले तरुण धीमान, जो ओंकार नगर-B, आरडब्ल्यूए के अध्यक्ष भी हैं, उन्होंने हमारे घर के निर्माण को 'अवैध' बताते हुए कोर्ट का नोटिस भिजवा दिया। विडंबना यह है कि पूरे त्रिनगर में लगभग सभी घर एक ही तरह के नक्शों और उन्हीं कायदों पर बने हैं, जिनका उल्लंघन वहां की आम जिंदगी का हिस्सा है। खुद आरडब्ल्यूए अध्यक्ष के घर में गैर-कानूनी निर्माण और बेसमेंट मौजूद है, लेकिन कानून की तलवार सिर्फ हमारे घर पर लटकाई गई। यह भेदभाव उस 'हाउसिंग इनइक्वालिटी' (रिहाइशी गैर-बराबरी) का जीता-जागता उदाहरण है, जिसका जिक्र अक्सर देखने में मिलता है। भारत में मुस्लिम समुदायों के खिलाफ मकान मिलने में होने वाले भेदभाव की जड़ें अब बहुत गहरी और डरावनी हो चुकी हैं। हाल के सालों में भारत के शहरों से ऐसी कई खबरें आईं जहाँ हिंदू-बाहुल्य इलाकों में घर खरीदने वाले मुस्लिम परिवारों को पड़ोसियों और कट्टरपंथी संगठनों ने मिलकर वहां से जाने पर मजबूर कर दिया।

2021 में मुरादाबाद में दो मुस्लिम परिवारों द्वारा हिंदुओं से घर खरीदने पर हुए बड़े विरोध प्रदर्शन इस बात का सबूत हैं कि अब मिल-जुलकर रहना एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। रिपोर्ट्स बताती हैं कि गुजरात और महाराष्ट्र से लेकर राजधानी दिल्ली तक में मुस्लिम परिवारों के लिए घर खरीदना या किराए पर लेना एक कठिन इम्तिहान बन गया है। यहाँ तक कि बॉलीवुड कलाकार इमरान हाशमी जैसे रसूखदार लोगों को भी मुंबई जैसे बड़े शहर में मुस्लिम होने की वजह से फ्लैट देने से मना किया गया। यह महज एक सामाजिक बुराई नहीं, बल्कि भारत के संविधान द्वारा दिए गए समानता और सम्मान के साथ जीने के बुनियादी अधिकारों का सीधा उल्लंघन है नफरत का असर था कि नमाज से लौट रहे दो नाबालिग बच्चों को पकड़कर पीटा गया और उन पर मंदिर की तरफ थूकने का झूठा आरोप लगाया गया।

तनाव को बढ़ाने के लिए मीडिया के एक वर्ग और कुछ स्थानीय लोगों ने मिलकर एक ऐसी कहानी बुनी, जिसमें हमें पूरी तरह से गुनहगार बना दिया गया। 21 फरवरी को मंदिर के पास एक अंडे की रेहड़ी लगाने वाले सुभाष राठौर की दुकान में तोड़-फोड़ की गई और मीडिया को बताया गया कि यह मुस्लिमों ने किया है क्योंकि वे मंदिर नहीं तोड़ पाए। इस नफरत का नतीजा यह हुआ कि इलाके में सीआरपीएफ (CRPF) तैनात करनी पड़ी। आरडब्ल्यूए के कुछ लोगों पर यह भी आरोप है कि वे खुद ही रात के अंधेरे में मंदिर के सामने हड्डियां फेंकते थे और फिर मीडिया को बुलाकर हमारी तरफ कैमरा तानकर हमें मंदिर विरोधी साबित करते थे। मार्च के महीने में यह मामला और भी हिंसक हो गया जब प्रीत सिरोही नाम के व्यक्ति ने सोशल मीडिया पर हमें खुली धमकी दी। 19 मार्च की रात को लगभग 400-500 लोगों की हिंसक भीड़ हमारे घर के बाहर झंडे और डंडे लेकर जमा हो गई। उस रात जो नारे लगे "जिहादियों बाहर निकलो, तुम्हारे खून से होली खेलेंगे" वे आज भी परिवार के हर सदस्य को डरा देते हैं। अगर उस रात दिल्ली पुलिस ने मुस्तैदी नहीं दिखाई होती, तो शायद आज मैं यह लेख लिखने के लिए जिंदा नहीं होता।

यह सब विस्तार से लिखने का मेरा मकसद नफरत फैलाना नहीं, बल्कि यह बताना है कि कैसे एक शांतिपूर्ण इलाके को साम्प्रदायिक प्रयोग की जगह में बदला जा रहा है। रिहाइशी इलाकों में बढ़ता यह अलगाव न केवल निजी जीवन को तबाह कर रहा है, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के भविष्य के लिए भी एक बड़ा संकट है। यह सिर्फ मेरा घर बचाने की लड़ाई नहीं है, बल्कि उस संवैधानिक अधिकार को बचाने की कोशिश है जो हर भारतीय नागरिक को देश के किसी भी हिस्से में सम्मान के साथ रहने का भरोसा देता है। जब पड़ोसी ही एक-दूसरे के दुश्मन बन जाएं, तो समाज का ताना-बाना बिखरने लगता है। मुझे दुख इस बात का है कि प्रशासन अक्सर तब तक खामोश रहता है जब तक कोई बड़ी अनहोनी न हो जाए।

मैं उन समझदार हिंदू भाइयों का भी शुक्रिया अदा करना चाहता हूँ जिन्होंने इस मुश्किल वक्त में हमारा साथ दिया। उन्होंने खुलेआम इन नफरती लोगों की गुंडागर्दी का विरोध किया और हमें अहसास कराया कि असली हिंदू धर्म वह है जो पड़ोसी की रक्षा करे, न कि वह जो चंद लोगों की राजनीति के लिए किसी का घर जला दे। यह लेख एक चेतावनी है। अगर हम शहरों में बढ़ते इस 'घेटोइजेशन' (बस्तियों के बंटवारे) को नहीं रोक पाए, तो हमारे शहर साझा संस्कृति के केंद्र नहीं बल्कि नफरत के ठिकाने बन जाएंगे। सरकार को मकान मिलने में होने वाले भेदभाव के खिलाफ सख्त कानून बनाने होंगे और समाज को यह समझना होगा कि किसी को उसके घर में डराकर कोई भी समुदाय महान नहीं बन सकता। हमें सच्चाई और संवैधानिक मूल्यों से इस नफरत का मुकाबला करना होगा, इससे पहले कि ये जड़ें हमारे पूरे देश को अपनी चपेट में ले लें।

अमान अली एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं। वे पिछले दो दशकों से दिल्ली के त्रिनगर में निवास कर रहे हैं
 

 

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