नई दिल्ली: विदेशी अंशदान नियमन अधिनियम (FCRA) में संशोधन के लिए प्रस्तावित विधेयक को लेकर सियासी घमासान तेज हो गया है। कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों ने बिल का विरोध करते हुए इसे अल्पसंख्यक संगठनों के हितों के खिलाफ बताया है। कांग्रेस नेताओं का आरोप है कि प्रस्तावित बदलावों का असर विशेष रूप से ईसाई समुदाय द्वारा संचालित स्कूलों, अस्पतालों और सामाजिक संस्थाओं पर पड़ सकता है।
कांग्रेस के संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल ने केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि विपक्ष इस विधेयक को आसानी से आगे नहीं बढ़ने देगा। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार FCRA के प्रावधानों के जरिए उन संस्थाओं पर दबाव बनाने की कोशिश कर रही है, जो सामाजिक और जनकल्याण के क्षेत्र में काम कर रही हैं।
कांग्रेस ने क्यों जताई आपत्ति?
विपक्ष का कहना है कि FCRA में प्रस्तावित बदलाव विदेशी चंदे से संचालित गैर-सरकारी संगठनों और धार्मिक-सामाजिक संस्थाओं के लिए मुश्किलें बढ़ा सकते हैं। कांग्रेस ने इसे ‘एंटी-क्रिश्चियन’ करार देते हुए कहा है कि इसका प्रभाव ईसाई समुदाय से जुड़े शिक्षण और स्वास्थ्य संस्थानों पर पड़ सकता है।
पार्टी का तर्क है कि कई संस्थाएं विदेशी योगदान की मदद से स्कूल, अस्पताल, राहत कार्य और अन्य सामाजिक सेवाएं संचालित करती हैं। ऐसे में नियमों को और सख्त किए जाने से उनके कामकाज पर असर पड़ने की आशंका है।
सरकार और विपक्ष आमने-सामने
FCRA को लेकर पहले भी केंद्र सरकार और विपक्ष के बीच टकराव देखने को मिलता रहा है। सरकार का पक्ष रहा है कि विदेशी फंडिंग में पारदर्शिता और राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा के लिए नियमों का पालन जरूरी है। वहीं विपक्ष का आरोप है कि सरकार FCRA और अन्य कानूनी प्रावधानों का इस्तेमाल गैर-सरकारी संगठनों और सरकार की आलोचना करने वाली संस्थाओं पर दबाव बनाने के लिए कर रही है।
प्रस्तावित संशोधन को लेकर अब संसद में बहस और तेज होने की संभावना है। कांग्रेस ने साफ कर दिया है कि वह इस बिल का विरोध जारी रखेगी और इसे मौजूदा स्वरूप में आगे बढ़ने से रोकने की कोशिश करेगी।