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गुरु पूर्णिमा विशेष: गुरु परंपरा का पर्व, भारतीय संस्कृति की अमूल्य विरासत

 

 

नई दिल्ली: भारत की सांस्कृतिक परंपराओं में गुरु पूर्णिमा का विशेष स्थान है। यह पर्व हर वर्ष आषाढ़ मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है और गुरु के प्रति सम्मान, श्रद्धा तथा कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन महर्षि वेदव्यास का जन्म हुआ था। उन्होंने वेदों का संकलन, महाभारत की रचना तथा अनेक पुराणों का संपादन किया, इसलिए उन्हें व्यास ऋषि और “आदि गुरु” के रूप में भी सम्मान दिया जाता है। इसी कारण गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है।

इतिहासकारों और विद्वानों के अनुसार गुरु-शिष्य परंपरा भारत में हजारों वर्षों से चली आ रही है। वैदिक काल में शिक्षा गुरुकुलों में दी जाती थी, जहाँ गुरु केवल ज्ञान ही नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला, नैतिक मूल्य, अनुशासन और समाज के प्रति जिम्मेदारी भी सिखाते थे। यही परंपरा भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी पहचान मानी जाती है।

धार्मिक दृष्टि से भी गुरु का स्थान अत्यंत ऊँचा माना गया है। प्रसिद्ध श्लोक “गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः” गुरु को सृष्टि के पालन और मार्गदर्शन का प्रतीक बताता है। हिंदू धर्म के साथ-साथ बौद्ध और जैन परंपराओं में भी गुरु पूर्णिमा का विशेष महत्व है। बौद्ध मान्यता के अनुसार भगवान बुद्ध ने ज्ञान प्राप्ति के बाद इसी दिन सारनाथ में अपने प्रथम पाँच शिष्यों को उपदेश दिया था, जिसे धर्मचक्र प्रवर्तन का प्रारंभ माना जाता है।

आज के समय में गुरु पूर्णिमा का स्वरूप और भी व्यापक हो गया है। विद्यालयों, विश्वविद्यालयों, आश्रमों और विभिन्न सामाजिक संस्थानों में शिक्षक, आध्यात्मिक गुरु, प्रशिक्षक और मार्गदर्शकों का सम्मान किया जाता है। विद्यार्थी अपने शिक्षकों के प्रति आभार व्यक्त करते हैं और उनसे जीवन में सही दिशा देने का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक दौर में तकनीक और डिजिटल शिक्षा के विस्तार के बावजूद गुरु का महत्व कम नहीं हुआ है। ज्ञान के साथ संस्कार, विवेक और सही निर्णय लेने की प्रेरणा आज भी गुरु से ही प्राप्त होती है। यही कारण है कि गुरु पूर्णिमा केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, शिक्षा और जीवन मूल्यों को सहेजने वाला एक महत्वपूर्ण उत्सव माना जाता है।

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BY Himanshu Dubey ·