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पूर्वांचल में बदली धान रोपाई की तस्वीर, ₹250 तक पहुंची मजदूरी, नाश्ते में समोसा-जलेबी की बढ़ी मांग

 

 

 

उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में धान रोपाई का मौसम शुरू होते ही खेतों में रौनक लौट आती हैं इसके साथ ही कृषि मजदूरी और काम करने की परिस्थितियों में भी बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है।

ग्रामीणों के अनुसार, आज धान रोपाई के लिए महिलाओं को करीब ₹250 प्रतिदिन मजदूरी दी जा रही है। कुछ साल पहले यही काम ₹100 प्रतिदिन में कराया जाता था. बढ़ती महंगाई और श्रमिकों की मांग के चलते मजदूरी में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।

ग्रामीणों के अनुसार, पहले के मुकाबले अब धान रोपाई करने वाली महिलाओं की आर्थिक स्थिति बेहतर हुई है। हालांकि, दूसरी ओर किसानों का कहना है कि मजदूरी और खेती की लागत बढ़ने से कृषि पर खर्च भी पहले की तुलना में काफी बढ़ गया है. कुल मिलाकर, पूर्वांचल के गांवों में धान रोपाई से जुड़ी तस्वीर अब पहले से काफी बदली हुई नजर आ रही है

सिर्फ मजदूरी ही नहीं, बल्कि खेतों में मिलने वाले नाश्ते का स्वरूप भी बदल गया है। पहले धान लगाने वाली महिलाओं को नाश्ते में गेहूं, मटर और चने की घुघरी दी जाती थी। अब कई जगह महिलाएं समोसा, जलेबी और पकौड़े जैसे नाश्ते की मांग करती हैं।

ग्रामीणों का कहना है कि समय के साथ लोगों की जीवनशैली, खान-पान और जरूरतों में बदलाव आया है। हालांकि, खेती की लागत भी लगातार बढ़ी है, जिससे किसानों पर आर्थिक दबाव पहले की तुलना में अधिक महसूस किया जा रहा है।

ग्रामीण क्षेत्रों में धान रोपाई से जुड़ी यह बदलती तस्वीर एक ओर श्रमिकों की बेहतर आय और बदली जीवनशैली को दर्शाती है, तो दूसरी ओर किसानों के बढ़ते खर्च की चुनौती को भी सामने लाती है।

वाराणसी/गाजीपुर/जौनपुर/आजमगढ़/बलिया/मऊ/चंदौली पूर्वांचल में मानसून की रफ्तार के साथ धान रोपाई का काम जोरों पर है। खेतों में बड़ी संख्या में महिलाएं धान लगाने में जुटी हैं। इस बीच मजदूरी और खेतों में मिलने वाले नाश्ते की परंपरा में भी बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है।

ग्रामीणों के अनुसार, कुछ वर्षों पहले धान रोपाई के लिए महिलाओं को पूरे दिन की मेहनत के बदले करीब ₹100 मजदूरी मिलती थी। अब कई इलाकों में यह बढ़कर ₹250 प्रतिदिन तक पहुंच गई है। हालांकि, मजदूरी की दर गांव और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग हो सकती है।

सरकार की विभिन्न योजनाओं और ग्रामीण रोजगार पर केंद्रित प्रयासों का असर भी ग्रामीण महिलाओं की आर्थिक स्थिति पर देखने को मिल रहा है। स्वयं सहायता समूह (SHG), आजीविका मिशन और कृषि से जुड़े प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से कई महिलाएं अतिरिक्त आय के अवसरों से जुड़ रही हैं। इससे उनकी आर्थिक भागीदारी बढ़ी है और परिवार की आय में भी योगदान बढ़ा है।

सरकार द्वारा कुछ योजनाएं महिलाओं के लिए 

  • राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (NRLM) – स्वयं सहायता समूहों के जरिए महिलाओं को स्वरोजगार और आजीविका से जोड़ने की पहल।
  • दीनदयाल अंत्योदय योजना – ग्रामीण गरीब परिवारों, विशेषकर महिलाओं, को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने की योजना।
  • महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) – ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने की योजना।

धान रोपाई करने वाली महिलाओं की समस्याएं

  • पूरे दिन पानी और कीचड़ में खड़े होकर काम करना पड़ता है।
  • कमर, घुटनों और पैरों में तेज दर्द की शिकायत रहती है।
  • धूप, बारिश और उमस में लगातार मेहनत करनी पड़ती है।
  • लंबे समय तक झुककर काम करने से शरीर में थकान और कमजोरी होती है।
  • कई जगह मजदूरों की कमी के कारण काम का बोझ बढ़ जाता है।
  • मजदूरी बढ़ने के बावजूद महंगाई के कारण बचत कम हो पाती है।
  • खेतों में कीड़े-मकोड़ों और त्वचा संबंधी संक्रमण का खतरा बना रहता है।
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