गर्मियों में दूध बचाने के लिए सरकार ने लगाया था सख्त प्रतिबंध, सीमा पर होती थी गाड़ियों की तलाशी
लखनऊ: आज अगर कोई व्यक्ति उत्तर प्रदेश से दिल्ली की ओर दूध, खोया या पनीर लेकर जाए तो शायद ही उसे रोककर पूछताछ किए जाने की कल्पना करे। लेकिन करीब पांच दशक पहले तस्वीर बिल्कुल अलग थी। 1970 के दशक में उत्तर प्रदेश में दूध और उससे बने उत्पादों की आवाजाही को लेकर सरकार इतनी सख्त थी कि पुलिस दूध से भरी गाड़ी तक की तलाशी ले सकती थी। खोया और दूसरे प्रतिबंधित दूध उत्पाद बिना अनुमति राज्य से बाहर ले जाना मुश्किल था।
यह कहानी उस दौर की है, जब गर्मियों में दूध की कमी सरकार के लिए बड़ी चिंता बन जाती थी और आम लोगों तक पीने का दूध पहुंचाने के लिए दूध से बनने वाले कई उत्पादों पर रोक तक लगा दी गई थी।
गर्मियों में क्यों बढ़ गई थी दूध की चिंता?
इस पूरी व्यवस्था की शुरुआत दूध की मौसमी कमी से जुड़ी थी। मई-जून की गर्मी में पशुओं के चारे, मौसम और उत्पादन पर असर पड़ता था। दूसरी ओर शहरों में दूध की मांग बनी रहती थी। सरकार को आशंका थी कि बाजार में आने वाला दूध बड़ी मात्रा में खोया, रबड़ी, पनीर, क्रीम, मक्खन और मिठाइयों में इस्तेमाल हो रहा है।
ऐसे में सरकार के सामने सवाल था कि सीमित मात्रा में उपलब्ध दूध का इस्तेमाल पहले किसके लिए हो? सरकार का जवाब साफ था—पहले लोगों को पीने के लिए दूध मिले, उसके बाद उससे मिठाइयां और दूसरे उत्पाद बनाए जाएं।
1974 में आया पहला बड़ा आदेश
2 अप्रैल 1974 को उत्तर प्रदेश सरकार ने दूध से जुड़े उत्पादों पर सख्ती का आदेश जारी किया। उस समय प्रदेश के मुख्यमंत्री हेमवती नंदन बहुगुणा थे। आदेश कई जिलों में लागू किया गया।
सरकार ने दूध से खोया बनाने पर रोक लगा दी। रबड़ी और पनीर बनाने पर भी प्रतिबंध लगाया गया। क्रीम तथा ऐसे कई खाद्य उत्पादों के निर्माण और बिक्री पर भी पाबंदी लगाई गई, जिनमें दूध या दूध से बने उत्पाद का इस्तेमाल होता था।
सरकार का तर्क था कि गर्मियों में जब तरल दूध की उपलब्धता कम हो जाती है, तब उसका बड़ा हिस्सा दूसरे उत्पादों में इस्तेमाल होने से आम लोगों के लिए दूध की कमी और गंभीर हो सकती है।
कुल्फी को मिली थी थोड़ी राहत
इस प्रतिबंध में एक दिलचस्प अपवाद भी था। गर्मियों में कुल्फी और आइसक्रीम की मांग को देखते हुए इन्हें पूरी तरह प्रतिबंधित नहीं किया गया। कुल्फी, कुल्फा और आइसक्रीम बनाने और बेचने की अनुमति थी, लेकिन इनके निर्माण में खोया, रबड़ी या क्रीम के इस्तेमाल पर रोक थी।
यानी सरकार का उद्देश्य दूध से बने हर उत्पाद को बंद करना नहीं था, बल्कि उन उत्पादों पर ज्यादा सख्ती करना था जिनमें बड़ी मात्रा में तरल दूध खपने की आशंका थी।
हलवाई पहुंचे हाई कोर्ट
सरकार के इस फैसले से हलवाई और दूध से जुड़े कारोबार करने वाले लोग परेशान हो गए। मुरादाबाद के कुछ कारोबारियों ने इलाहाबाद हाई कोर्ट का रुख किया। उनका तर्क था कि सरकारी आदेश से उनके पारंपरिक कारोबार पर सीधा असर पड़ रहा है।
अदालत में यह सवाल भी उठा कि अगर खोया और रबड़ी पर रोक है तो कुल्फी और आइसक्रीम को इससे अलग क्यों रखा गया? सरकार ने अपने फैसले का बचाव करते हुए दूध की उपलब्धता और जनता की जरूरत को आधार बनाया।
अदालत ने सरकार के तर्क को स्वीकार किया। दूध को विशेष रूप से बच्चों, बुजुर्गों और कमजोर लोगों के लिए महत्वपूर्ण पोषण स्रोत माना गया। गर्मियों में उत्पादन घटने की स्थिति में पीने वाले दूध की उपलब्धता बनाए रखना सरकार की जिम्मेदारी के दायरे में माना गया।
1976 में कानून और ज्यादा सख्त हुआ
लेकिन दूध पर सरकारी नियंत्रण की असली तस्वीर 1976 में सामने आई। उस समय देश में आपातकाल लागू था और उत्तर प्रदेश में नारायण दत्त तिवारी मुख्यमंत्री थे।
इसी दौर में उत्तर प्रदेश दूध अधिनियम, 1976 लाया गया। इस कानून ने दूध के उत्पादन, आपूर्ति और उससे जुड़े उत्पादों पर सरकारी नियंत्रण के लिए ज्यादा स्थायी कानूनी ढांचा तैयार किया।
इसके बाद 23 अगस्त 1976 को उत्तर प्रदेश मिल्क एंड मिल्क प्रोडक्ट्स एक्सपोर्ट कंट्रोल ऑर्डर जारी किया गया। इसका उद्देश्य उत्तर प्रदेश से दूध और दूध से बने उत्पादों की दूसरे राज्यों में आवाजाही को नियंत्रित करना था।
यूपी से बाहर खोया ले जाना भी आसान नहीं था
नए नियमों के तहत उत्तर प्रदेश से बाहर दूध या कुछ दूध उत्पाद ले जाने के लिए अनुमति और परमिट की व्यवस्था लागू की गई। सरकार को आशंका थी कि अगर दूध और खोया बड़ी मात्रा में दूसरे राज्यों में चला गया तो प्रदेश के शहरों और कस्बों में पीने के दूध की कमी पैदा हो सकती है।
उत्तर प्रदेश की सीमा के आसपास के इलाके को भी विशेष निगरानी के दायरे में रखा गया। यही वह व्यवस्था थी जिसने दूध की आवाजाही को सामान्य कारोबार से निकालकर कड़ी सरकारी निगरानी के दायरे में ला दिया।
पुलिस को मिली थी तलाशी की ताकत
इस व्यवस्था का सबसे दिलचस्प हिस्सा पुलिस की भूमिका थी। नियमों के तहत अधिकृत पुलिस अधिकारी संदिग्ध व्यक्ति, वाहन और दूध के कंटेनर की जांच कर सकते थे। जरूरत पड़ने पर दूध जमा होने या प्रतिबंधित उत्पाद बनाए जाने के संदेह वाले स्थानों की तलाशी भी ली जा सकती थी।
यानी अगर किसी वाहन में दूध या प्रतिबंधित दूध उत्पाद राज्य की सीमा पार ले जाए जा रहे हैं और जरूरी अनुमति नहीं है, तो कार्रवाई का रास्ता खुल जाता था।
दूध की कमी से निपटने की कोशिश या कारोबार पर चोट?
सरकार के लिए यह व्यवस्था जनता को पर्याप्त मात्रा में पीने का दूध उपलब्ध कराने का उपाय थी। लेकिन दूध और उससे जुड़े उत्पादों का कारोबार करने वालों के लिए यह बड़ा झटका भी था।
एक तरफ सरकार का तर्क था कि सीमित दूध पहले आम जनता की जरूरत पूरी करे। दूसरी तरफ हलवाई, दूध कारोबारी और खोया बनाने वाले लोग इसे अपने व्यापार में सरकारी हस्तक्षेप के तौर पर देख रहे थे।
आज क्यों याद आती है यह कहानी?
आज दूध की सप्लाई, डेयरी उद्योग और खाद्य बाजार काफी बदल चुके हैं। दूध से बनने वाले उत्पादों का कारोबार बड़े औद्योगिक स्तर पर होता है। ऐसे समय में पीछे मुड़कर देखें तो 1970 के दशक का यह दौर बेहद अलग नजर आता है—जब दूध सिर्फ खाने-पीने की चीज नहीं, बल्कि सरकार की प्राथमिकता और नियंत्रण का विषय बन गया था।
जिस दूध से आज आसानी से खोया, पनीर और मिठाइयां बनती हैं, कभी उसी दूध को लेकर उत्तर प्रदेश में इतनी सख्ती थी कि पुलिस सड़क पर गाड़ी रोककर डिब्बों तक की जांच कर सकती थी।