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जन्म से दृष्टिबाधित सुनील की आवाज ने बॉलीवुड में मचाई धूम

कहते हैं कि हुनर किसी पहचान या सुविधा का मोहताज नहीं होता। अगर किसी इंसान के भीतर प्रतिभा और उसे आगे बढ़ाने का जुनून हो, तो मुश्किल से मुश्किल परिस्थितियां भी उसके रास्ते को रोक नहीं सकतीं। बुंदेलखंड के लोकगायक सुनील लोधी की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। जन्म से दृष्टिबाधित सुनील लोधी ने बेहद कठिन परिस्थितियों में भजन गाकर अपनी जिंदगी आगे बढ़ाई और आज उनकी आवाज बड़े पर्दे तक पहुंच चुकी है।

फिल्म 'हनुमान अंश' में सुनील लोधी की आवाज में गाया गया भजन 'मेरे संकट के कटैया हनुमान' इन दिनों लोगों के बीच चर्चा में है। भजन को सोशल मीडिया पर खूब पसंद किया जा रहा है और इसके वायरल होने के बाद बड़ी संख्या में लोग इसके गायक के बारे में जानने की कोशिश कर रहे हैं।

सुनील लोधी बुंदेलखंड के लोकगायक हैं और भगवान हनुमान के भक्त बताए जाते हैं। उनकी आवाज में लोक संगीत की सहजता और भक्ति का भाव सुनाई देता है। यही खासियत उनके भजन को अलग पहचान देती है।

कभी ट्रेन में गाकर करते थे गुजारा

आज जिस आवाज की चर्चा फिल्म और सोशल मीडिया की दुनिया में हो रही है, उसी आवाज के सहारे सुनील लोधी ने कभी अपनी रोजमर्रा की जिंदगी चलाने की कोशिश की थी। वह ट्रेन में भजन गाया करते थे। इसके अलावा वह गांव-गांव घूमकर भी लोगों के सामने भजन प्रस्तुत करते थे।

उनके पास महंगी संगीत शिक्षा या बड़े मंच की सुविधा नहीं थी। उनका साथ था तो सिर्फ एक तंबूरा और संगीत के प्रति उनका जुनून। इसी के सहारे उन्होंने अपनी गायकी को आगे बढ़ाया।

उनका जीवन शुरू से ही आसान नहीं रहा। जन्म से दृष्टिबाधित होने के कारण उन्हें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। परिवार की आर्थिक स्थिति भी इतनी मजबूत नहीं थी कि वह नियमित रूप से स्कूल जाकर पढ़ाई कर सकें। यही वजह रही कि उन्हें औपचारिक शिक्षा और संगीत की पेशेवर ट्रेनिंग का अवसर नहीं मिल पाया।

लेकिन इन परिस्थितियों ने उनके भीतर के कलाकार को खत्म नहीं किया। उन्होंने अपने आसपास के लोक संगीत और भजनों से सीखते हुए अपनी अलग शैली विकसित की।

10 साल की उम्र में सीखा तंबूरा

सुनील लोधी ने कम उम्र में ही संगीत की दुनिया में कदम रख दिया था। बताया जाता है कि उन्होंने करीब 10 साल की उम्र में तंबूरा बजाना सीख लिया था। इसके बाद यही वाद्य उनके भजनों का साथी बन गया।

उन्होंने किसी बड़े संगीत संस्थान से प्रशिक्षण नहीं लिया, लेकिन लगातार अभ्यास और प्रस्तुति के जरिए अपनी गायकी को निखारा। गांवों और धार्मिक आयोजनों में भजन गाते हुए उन्हें धीरे-धीरे लोगों के बीच पहचान मिलने लगी।

उनकी गायकी की सबसे बड़ी खासियत उनकी आवाज में मौजूद सहज भाव और भक्ति है। यही वजह है कि उनके भजनों को सुनने वाले लोग उनसे जुड़ाव महसूस करते हैं।

'हनुमान अंश' ने बदल दी पहचान

सुनील लोधी की आवाज लंबे समय तक स्थानीय स्तर पर लोगों तक सीमित रही, लेकिन सोशल मीडिया ने उनके हुनर को एक बड़ा मंच दिया। उनकी गायकी से जुड़े वीडियो इंटरनेट पर लोगों तक पहुंचे और धीरे-धीरे उनकी आवाज फिल्म के निर्माताओं तक भी पहुंची।

फिल्म 'हनुमान अंश' के निर्देशक विशाल चतुर्वेदी तक जब सुनील की आवाज पहुंची, तो उन्हें फिल्म के लिए भजन गाने का अवसर मिला। यह मौका सुनील के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित हुआ।

फिल्म में उनका गाया भजन 'मेरे संकट के कटैया हनुमान' रिलीज होने के बाद लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचने लगा। सोशल मीडिया पर भजन से जुड़े वीडियो और रील तेजी से साझा किए जाने लगे। इसके बाद लोगों ने सुनील लोधी की कहानी को भी जानना शुरू किया।

बिना स्कूल और बिना प्रोफेशनल ट्रेनिंग के मुकाम

सुनील लोधी की कहानी इसलिए भी खास है क्योंकि उन्होंने बिना औपचारिक शिक्षा और संगीत की पेशेवर ट्रेनिंग के अपनी पहचान बनाई। आर्थिक परिस्थितियों और दृष्टिबाधिता के बावजूद उन्होंने संगीत को अपनी ताकत बनाया।

उनके पास न कोई बड़ा संगीत संस्थान था, न कोई फिल्मी गॉडफादर और न ही शुरुआत में बड़े मंच तक पहुंचने का कोई आसान रास्ता। इसके बावजूद उन्होंने लगातार भजन गाए और अपनी कला को लोगों तक पहुंचाते रहे।

उनका तंबूरा, उनकी आवाज और भगवान हनुमान के प्रति उनकी आस्था उनके सफर के महत्वपूर्ण हिस्से रहे हैं। यही साधना उन्हें धीरे-धीरे बड़े मंच तक लेकर आई।

सोशल मीडिया पर बढ़ी लोकप्रियता

'मेरे संकट के कटैया हनुमान' के वायरल होने के बाद सुनील लोधी की लोकप्रियता तेजी से बढ़ी है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर लोग उनके भजन को साझा कर रहे हैं और उनके बारे में जानकारी तलाश रहे हैं।

भजन की लोकप्रियता ने सुनील की पुरानी जिंदगी और उनके संघर्ष की कहानी को भी लोगों के सामने ला दिया है। जिन लोगों ने उन्हें कभी ट्रेन या गांव में भजन गाते हुए सुना होगा, उनके लिए यह बदलाव किसी बड़ी उपलब्धि से कम नहीं है।

अब उनकी आवाज फिल्मी संगीत से जुड़े दर्शकों तक पहुंच रही है। उनके लिए यह सफर केवल एक गाना मिलने की कहानी नहीं है, बल्कि वर्षों के संघर्ष, अभ्यास और अपनी कला के प्रति विश्वास का परिणाम भी है।

संघर्ष से सफलता तक का सफर

सुनील लोधी की कहानी यह बताती है कि किसी व्यक्ति की परिस्थितियां उसकी प्रतिभा की सीमा तय नहीं करतीं। जन्म से दृष्टिबाधित होने के बावजूद उन्होंने संगीत को अपना माध्यम बनाया और लगातार अपनी कला को लोगों के सामने रखा।

कभी ट्रेन में भजन गाकर अपनी जरूरतें पूरी करने वाले सुनील आज फिल्मी पर्दे पर अपनी आवाज के जरिए पहचान बना रहे हैं। उनकी कहानी उन कलाकारों के लिए भी प्रेरणा बन सकती है जिन्हें संसाधनों की कमी के कारण अपनी प्रतिभा को सामने लाने का अवसर नहीं मिलता।

'हनुमान अंश' में उनकी आवाज का इस्तेमाल उनके लंबे संघर्ष के बाद मिला एक बड़ा अवसर है। इस भजन की लोकप्रियता ने न केवल उनकी गायकी को नई पहचान दी है, बल्कि उनके जीवन की कहानी को भी लोगों तक पहुंचाया है।

सुनील लोधी का सफर अभी जारी है। लेकिन इतना जरूर है कि जिस आवाज ने कभी ट्रेनों और गांवों में लोगों को भजन सुनाए, वही आवाज अब फिल्मी दर्शकों और सोशल मीडिया तक पहुंच चुकी है।

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