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पूर्वांचल की लोकसंस्कृति की अनोखी रात: जब कजरी के सुरों संग रातभर जागता है बनारस, जानिए रातजगा की सदियों पुरानी परंपरा

 

 

जब रात ढलती है तो सजती है लोकगीतों की महफिल, महिलाएं गाती हैं कजरी और गीतों में उतर आता है सावन का रंग

वाराणसी: बनारस को अगर सिर्फ मंदिरों, घाटों और गंगा आरती की नगरी समझा जाए तो यह शहर की आधी तस्वीर होगी। बनारस की असली पहचान उसकी गलियों, बोली, संगीत और लोक परंपराओं में भी बसती है। इन्हीं परंपराओं में एक खास नाम है ‘रतजगा’, जिसमें रात सिर्फ सोने के लिए नहीं बल्कि गीत-संगीत, भक्ति और सामूहिक उल्लास के लिए जागती है।

मुख्यतौर पर बनारस की गलियों में रक्षाबंधन के आसपास की रातें एक अलग ही रंग लिए होती हैं। मायके पहुँची महिलाएँ रातजगा करती हैं और कजरी गीतों के जरिए अपने मन के सुख-दुख, विरह और भावनाओं को शब्द देती हैं। इस दौरान घरों में पारंपरिक जलेबा जैसी मिठाइयाँ बनती हैं, जिनका स्वाद लेते हुए महिलाएँ देर रात तक कजरी गाती हैं। यह सिर्फ गीत-संगीत नहीं, बल्कि बनारस की लोकसंस्कृति में स्त्रियों की भावनाओं को अभिव्यक्त करने वाली एक खूबसूरत परंपरा है।

पूर्वांचल की लोक-संस्कृति में रतजगा का अपना अलग महत्व रहा है।

हिन्दवी डिक्शनरी के अनुसार ‘रतजगा’ का अर्थ किसी उत्सव या आनंदोत्सव के लिए पूरी रात जागकर बिताना है। इसमें पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार में भाद्रपद कृष्ण द्वितीया की रात महिलाओं द्वारा कजली आदि गीत गाने की परंपरा का भी उल्लेख मिलता है। 

रातभर चलने वाली इस महफिल में गीतों के साथ हँसी-ठिठोली और पकवानों का दौर भी चलता है। घरों में पारंपरिक जलेबा जैसी मिठाइयाँ तैयार होती हैं, जिन्हें खाते हुए महिलाएँ कजरी गाती हैं और अपनी सहेलियों-बहनों के साथ सुख-दुख साझा करती हैं। यही बनारस की खासियत है—यहाँ त्योहार सिर्फ मनाए नहीं जाते, बल्कि लोकगीतों, स्वाद और भावनाओं के साथ जिए जाते हैं।

रतजगा आखिर होता क्या है?

रतजगा का सीधा अर्थ है—रातभर जागना, लेकिन लोक परंपरा में इसका अर्थ इससे कहीं व्यापक है। यह ऐसी सामूहिक रात होती है जहां लोग एक जगह जुटते हैं और गीत, भजन, लोकगायन तथा पारंपरिक मनोरंजन के जरिए रात बिताते हैं।

रेख्ता शब्दकोश भी ‘रतजगा’ को रातभर जागने और धार्मिक या उत्सवी अवसर पर जागरण से जोड़ता है। यानी अलग-अलग इलाकों में इसके रूप और उद्देश्य अलग हो सकते हैं। 

पूर्वांचल में कजरी से जुड़ा खास रिश्ता

पूर्वांचल का नाम आते ही कजरी की याद आना स्वाभाविक है। सावन-भादों की बारिश, विरह, प्रेम, मायके की याद और गांव की जिंदगी—इन सब भावनाओं को कजरी अपने सुरों में समेटती है।

रतजगा की रातों में जब महिलाएं समूह में कजरी गाती हैं तो माहौल सिर्फ संगीत का नहीं रहता, बल्कि सामूहिक स्मृति और लोकजीवन का उत्सव बन जाता है।

यही वजह है कि रतजगा को केवल ‘जागने की रात’ कहना इसके सांस्कृतिक महत्व को छोटा कर देना होगा।

महिलाओं की आवाज से सजती थी रात

पूर्वांचल की कई लोक परंपराओं में महिलाओं की सामूहिक गायकी महत्वपूर्ण रही है। रतजगा भी इसका उदाहरण है। शब्दकोशीय संदर्भ में भी पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के रतजगा में महिलाओं द्वारा रातभर कजली जैसे लोकगीत गाने का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। 

इन गीतों में सिर्फ मनोरंजन नहीं होता था। गीतों के जरिए रिश्ते, प्रेम, विरह, मौसम, सामाजिक जीवन और ग्रामीण अनुभव अगली पीढ़ी तक पहुंचते थे।

ढोलक की थाप से लेकर लोकगीतों की तान तक

रतजगा की महफिल में स्थानीय परंपरा के अनुसार ढोलक, मंजीरा, हारमोनियम जैसे वाद्ययंत्रों का इस्तेमाल किया जा सकता है। कहीं भजन प्रमुख होते हैं तो कहीं लोकगीत और कजरी।

यानी हर जगह रतजगा का स्वरूप एक जैसा नहीं है। कहीं यह धार्मिक आयोजन है, कहीं लोक उत्सव और कहीं सामुदायिक जागरण। इसी विविधता में इसकी असली खूबसूरती छिपी है।

सिर्फ बनारस नहीं, पूरे पूर्वांचल की सांस्कृतिक पहचान

रतजगा को केवल बनारस तक सीमित करके देखना सही नहीं होगा। उपलब्ध शब्दकोशीय संदर्भ इसे पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार की लोकपरंपरा से जोड़ते हैं। 

पूर्वांचल के गांवों में रातभर सामूहिक रूप से जागने और गीत गाने की परंपराओं के कई स्थानीय रूप मिलते हैं। हाल के वर्षों की एक खबर में उत्तर प्रदेश के कानपुर क्षेत्र में आयोजित ‘रातजगा’ में महिलाओं और पुरुषों की अलग-अलग लोकगीत मंडलियों के आमने-सामने गायन का भी उल्लेख मिलता है।

इससे यह समझ आता है कि ‘रातजगा’ शब्द आज भी अलग-अलग लोक-सांस्कृतिक संदर्भों में जीवित है।

गीतों में छिपा होता था गांव का इतिहास

लोकगीतों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि वे सिर्फ गाने नहीं होते। वे उस समाज की मौखिक स्मृति होते हैं।

जिस बात को किताबों में लिखने का चलन नहीं था, वह गीतों में बची रही। मौसम बदला, फसल आई, बेटी की विदाई हुई, किसी का इंतजार रहा या सावन आया—इन तमाम अनुभवों को लोकगीतों ने अपनी धुन में सुरक्षित रखा।

रतजगा जैसी रातें इसी मौखिक परंपरा को आगे बढ़ाने का माध्यम बनती थीं।

रतजगा और आज का बदलता समय

आज मोबाइल, इंटरनेट और सोशल मीडिया के दौर में रातें बदल गई हैं। पहले जहां गांव-मोहल्ले के लोग एक जगह बैठकर गीत सुनते और गाते थे, वहीं अब मनोरंजन के साधन व्यक्तिगत हो गए हैं।

इसके बावजूद लोक परंपराओं की अहमियत खत्म नहीं हुई। बल्कि ऐसे आयोजनों को दोबारा याद करना इसलिए जरूरी है क्योंकि इनके जरिए नई पीढ़ी को यह पता चलता है कि उनके क्षेत्र की संस्कृति सिर्फ इमारतों और इतिहास में नहीं, बल्कि गीतों और बोलियों में भी जिंदा है।

बनारस की रात में जब गूंजती है कजरी

बनारस का सांस्कृतिक जीवन वैसे भी संगीत से गहराई से जुड़ा हुआ है। ऐसे में रतजगा जैसी लोक परंपरा इस शहर और पूर्वांचल के उस रंग को सामने लाती है जहां रात का सन्नाटा भी गीतों से टूटता है।

कहीं ढोलक की थाप सुनाई देती है, कहीं कजरी की तान, कहीं भक्ति के स्वर और कहीं लोग पुराने लोकगीतों को याद करते हुए नई पीढ़ी को सुनाते हैं।

रतजगा इसलिए सिर्फ रातभर जागने का नाम नहीं

यह सामूहिकता की रात है, लोकगीतों की रात है, महिलाओं की गायकी की रात है और पूर्वांचल की मौखिक संस्कृति को जिंदा रखने वाली परंपरा है।

बनारस और पूर्वांचल की ऐसी लोक परंपराएं यह याद दिलाती हैं कि संस्कृति सिर्फ संग्रहालयों में सुरक्षित चीज नहीं होती। वह तब तक जीवित रहती है, जब तक कोई उसे गाता है, सुनता है और अगली पीढ़ी तक पहुंचाता है।

और शायद इसी वजह से रतजगा की रात में नींद से ज्यादा जरूरी हो जाती है—लोक संस्कृति की वह आवाज, जो पूरी रात जागती रहती है।

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