लखनऊ। आज जो बड़ा इमामबाड़ा देश-विदेश के पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है, कभी वही इमारत अवध के लोगों के लिए मुश्किल दौर में रोजगार और सहारे का जरिया बनी थी। लखनऊ की ऐतिहासिक पहचान कहे जाने वाले बड़े इमामबाड़े का निर्माण अवध के नवाब आसफ-उद-दौला ने 1780 के दशक में अकाल के दौरान शुरू करवाया था।
उस समय अवध भीषण अकाल और आर्थिक तंगी से जूझ रहा था। आम लोगों के सामने रोजी-रोटी का संकट था। ऐसे समय में नवाब आसफ-उद-दौला ने एक ऐसी योजना शुरू की, जिसका मकसद सिर्फ एक भव्य इमारत बनाना नहीं, बल्कि लोगों को रोजगार उपलब्ध कराना था।
कहा जाता है कि निर्माण कार्य में बड़ी संख्या में लोगों को लगाया गया। दिन में मजदूर इमारत का निर्माण करते थे, जबकि रात में कुछ लोगों को उस निर्माण को तोड़ने का काम दिया जाता था। इसका उद्देश्य निर्माण को लंबा खींचकर ज्यादा से ज्यादा समय तक लोगों को रोजगार उपलब्ध कराना था।
लगभग एक दशक तक चले इस कठिन दौर के बाद बड़ा इमामबाड़ा वर्ष 1784 के आसपास पूरा हुआ। इस विशाल इमारत के निर्माण पर उस समय करीब 5 से 10 लाख रुपये खर्च होने का अनुमान लगाया जाता है।
बिना लोहे और बीम के बनी अद्भुत इमारत
बड़े इमामबाड़े की सबसे खास बात इसकी वास्तुकला है। मुगल शैली से प्रभावित इस इमारत के विशाल केंद्रीय हॉल की छत को सहारा देने के लिए लोहे की बीम या खंभों का इस्तेमाल नहीं किया गया है। मेहराबदार संरचना और विशेष वास्तु तकनीक के कारण यह इमारत आज भी इंजीनियरिंग और स्थापत्य कला का अद्भुत उदाहरण मानी जाती है।
जिस इमारत ने कभी अकाल के दौर में लोगों को रोजगार और जीवन का सहारा दिया था, आज वही लखनऊ की पहचान और देश-दुनिया से आने वाले पर्यटकों के लिए आकर्षण का बड़ा केंद्र है।
अकाल के दौर में बना यह इमामबाड़ा आज इतिहास, वास्तुकला और लखनऊ की तहजीब की ऐसी निशानी बन चुका है, जिसे देखने हर साल बड़ी संख्या में पर्यटक पहुंचते हैं
अकाल में रोजगार का अनोखा तरीका, अवध के नवाब ने बनवाया बड़ा इमामबाड़ा
अवध में जब भीषण अकाल और आर्थिक तंगी ने लोगों की जिंदगी मुश्किल कर दी थी, तब नवाब आसफ-उद-दौला ने जनता को राहत देने के लिए एक अनोखी पहल की। उन्होंने लखनऊ में बड़ा इमामबाड़ा बनवाने का फैसला किया, ताकि अकाल से जूझ रहे लोगों को रोजगार मिल सके और उनके घरों का चूल्हा जलता रहे।
कहा जाता है कि निर्माण कार्य में बड़ी संख्या में आम लोगों को रोजगार दिया गया। दिन में मजदूर इमामबाड़े के निर्माण में जुटते थे, जबकि रात में बनाए गए हिस्सों को गिरा दिया जाता था, ताकि अगले दिन फिर से लोगों को काम मिल सके। इस तरह जरूरतमंदों को लंबे समय तक रोजगार उपलब्ध कराने की कोशिश की गई।
बड़ा इमामबाड़ा सिर्फ वास्तुकला का अद्भुत उदाहरण नहीं है, बल्कि इसे अवध के उस दौर की जनकल्याणकारी सोच से भी जोड़कर देखा जाता है। आज यही इमामबाड़ा लखनऊ की ऐतिहासिक पहचान और देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों के आकर्षण का प्रमुख केंद्र है।
एक तरफ अकाल से जूझती जनता थी, तो दूसरी तरफ नवाब की ऐसी योजना, जिसने राहत के साथ रोजगार भी दिया। यही वजह है कि बड़ा इमामबाड़ा आज भी इतिहास के पन्नों में सिर्फ एक इमारत नहीं, बल्कि उस दौर की सामाजिक सोच की मिसाल के तौर पर याद किया जाता है।