निचली अदालतों में जज बनने की तैयारी कर रहे कानून के छात्रों और युवा वकीलों के लिए सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा बदलाव किया है। सर्वोच्च न्यायालय ने एंट्री-लेवल न्यायिक सेवा परीक्षा के लिए जरूरी वकालत के अनुभव की अवधि 3 साल से घटाकर 1 साल कर दी है। यानी अब सिविल जज (जूनियर डिवीजन) के पद के लिए उम्मीदवारों को परीक्षा में बैठने से पहले 3 साल की प्रैक्टिस की अनिवार्यता नहीं होगी। इसके बजाय 1 साल का वकालत अनुभव पर्याप्त होगा।
यह बदलाव सुप्रीम कोर्ट के उस पुराने फैसले में संशोधन के तौर पर आया है, जिसमें निचली न्यायपालिका में सीधे भर्ती के लिए 3 साल की कानूनी प्रैक्टिस जरूरी की गई थी। 2025 के फैसले में अदालत ने यह तर्क दिया था कि न्यायिक सेवा में आने वाले उम्मीदवारों के लिए अदालत के वास्तविक कामकाज और कानूनी प्रक्रिया का व्यावहारिक अनुभव जरूरी है। बाद में इस व्यवस्था की समीक्षा की मांग को लेकर याचिकाएं दायर की गईं और अदालत ने अब अपने पहले के निर्देश में बदलाव किया है।
अब उम्मीदवारों के लिए क्या बदलेगा?
नई व्यवस्था के तहत न्यायिक सेवा की एंट्री-लेवल परीक्षा में शामिल होने वाले उम्मीदवारों के लिए 1 साल की वकालत का अनुभव जरूरी होगा। इससे उन कानून स्नातकों को राहत मिलने की उम्मीद है, जो पढ़ाई पूरी करने के बाद कम समय में न्यायिक सेवा की परीक्षा देना चाहते हैं।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने व्यावहारिक अनुभव की जरूरत को पूरी तरह खत्म नहीं किया है। अदालत ने चयन के बाद प्रशिक्षण और क्लर्कशिप की व्यवस्था को भी महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया है। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक चयनित उम्मीदवारों के लिए 1 साल का गहन न्यायिक प्रशिक्षण और उसके बाद 1 साल की संरचित लॉ क्लर्कशिप का प्रावधान किया गया है। इस व्यवस्था का उद्देश्य उम्मीदवारों को अदालत के वास्तविक कामकाज का पर्याप्त अनुभव देना है।
इस तरह नई व्यवस्था में व्यावहारिक अनुभव का जोर खत्म नहीं हुआ है, बल्कि इसका एक हिस्सा परीक्षा से पहले और दूसरा हिस्सा चयन के बाद के प्रशिक्षण के रूप में रखा गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्यों बदला नियम?
3 साल की प्रैक्टिस की शर्त को लेकर यह तर्क सामने आया था कि लंबे अनुभव की अनिवार्यता से युवा कानून स्नातकों के लिए न्यायिक सेवा में प्रवेश का रास्ता कठिन हो सकता है। दूसरी ओर, अदालत का जोर यह भी रहा है कि केवल किताबी ज्ञान के आधार पर किसी उम्मीदवार को न्यायिक जिम्मेदारी देना पर्याप्त नहीं है और उसे अदालत की कार्यप्रणाली की समझ भी होनी चाहिए।
नए मॉडल में इन दोनों पहलुओं के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की गई है। उम्मीदवार को न्यूनतम 1 साल का कोर्ट प्रैक्टिस अनुभव लेना होगा और चयन के बाद उसे संस्थागत प्रशिक्षण तथा क्लर्कशिप से गुजरना होगा।
पुरानी व्यवस्था में क्या था?
सुप्रीम कोर्ट के 2025 के फैसले के बाद सिविल जज (जूनियर डिवीजन) की सीधी भर्ती के लिए 3 साल की प्रैक्टिस को अनिवार्य किया गया था। यह अवधि बार काउंसिल के साथ नामांकन और प्रैक्टिस से जुड़ी शर्तों के आधार पर निर्धारित की जानी थी। इस बदलाव का उद्देश्य न्यायिक सेवा में आने वाले उम्मीदवारों में व्यावहारिक कानूनी समझ को मजबूत करना था।
इसके बाद इस नियम को लेकर कई समीक्षा याचिकाएं दायर हुईं। जुलाई 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने इन याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए फैसला सुरक्षित रखा था और अब अदालत ने अपने पुराने रुख में बदलाव करते हुए प्रैक्टिस की न्यूनतम अवधि को 1 साल कर दिया है।
चयनित उम्मीदवारों के लिए प्रशिक्षण क्यों अहम होगा?
नई व्यवस्था में उम्मीदवारों के चयन के बाद होने वाला प्रशिक्षण काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। रिपोर्टों के अनुसार 1 साल की न्यायिक अकादमी ट्रेनिंग के बाद 1 साल की संरचित लॉ क्लर्कशिप की व्यवस्था होगी। इससे उम्मीदवारों को मुकदमों की सुनवाई, अदालत की प्रक्रिया, आदेश लिखने, रिकॉर्ड देखने और न्यायिक कामकाज को करीब से समझने का अवसर मिलेगा।
इस व्यवस्था से अदालत का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कम अवधि की प्रैक्टिस के बावजूद न्यायिक सेवा में प्रवेश करने वाले उम्मीदवारों को पर्याप्त व्यावहारिक अनुभव मिले।
युवाओं पर क्या असर पड़ेगा?
इस फैसले का सबसे सीधा असर कानून की पढ़ाई पूरी कर चुके युवाओं पर पड़ेगा। पहले 3 साल की प्रैक्टिस के कारण कई उम्मीदवारों को न्यायिक सेवा की परीक्षा देने से पहले लंबा समय इंतजार करना पड़ता था। अब 1 साल की प्रैक्टिस के बाद वे पात्रता पूरी कर सकेंगे।
इससे न्यायिक सेवा में करियर बनाने के इच्छुक युवा उम्मीदवारों के लिए प्रवेश का समय कम हो सकता है। साथ ही, लंबे समय तक बार में प्रैक्टिस करने की बाध्यता कम होने से न्यायिक सेवा की तैयारी करने वाले छात्रों को अपने करियर का रास्ता जल्दी तय करने का अवसर मिलेगा।
हालांकि, उम्मीदवारों को यह ध्यान रखना होगा कि अंतिम पात्रता संबंधित राज्य की न्यायिक सेवा परीक्षा की अधिसूचना और लागू नियमों पर निर्भर करेगी। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद संबंधित हाई कोर्ट और राज्य अपने भर्ती नियमों को उसी के अनुरूप लागू करेंगे।
फैसला क्यों महत्वपूर्ण है?
यह फैसला न्यायिक सेवा में भर्ती के मॉडल को लेकर एक महत्वपूर्ण बदलाव माना जा रहा है। एक ओर इससे युवा कानून स्नातकों के लिए न्यायिक सेवा में प्रवेश का रास्ता आसान हो सकता है, वहीं दूसरी ओर प्रशिक्षण और क्लर्कशिप के जरिए व्यावहारिक अनुभव की कमी को पूरा करने की कोशिश की गई है।
अर्थात अब मॉडल का फोकस केवल परीक्षा से पहले की लंबी प्रैक्टिस पर नहीं, बल्कि चयन से पहले न्यूनतम कोर्ट अनुभव और चयन के बाद व्यवस्थित न्यायिक प्रशिक्षण पर होगा। मेटा हेडलाइन
सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, जज बनने के लिए 3 नहीं 1 साल की वकालत
मेटा डिस्क्रिप्शन
सुप्रीम कोर्ट ने सिविल जज जूनियर डिवीजन की एंट्री-लेवल न्यायिक सेवा परीक्षा के लिए जरूरी वकालत अनुभव 3 साल से घटाकर 1 साल कर दिया है।