अमेरिका-इज़राइल और ईरान के बीच संघर्ष का आर्थिक असर एशिया-प्रशांत क्षेत्र पर भारी पड़ सकता है। अनुमान है कि इस संकट से क्षेत्र को 299 अरब डॉलर तक का नुकसान हो सकता है और लाखों लोग गरीबी की कगार पर पहुंच सकते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, परिवहन, ऊर्जा और खाद्य कीमतों में तेजी से बढ़ोतरी के कारण क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर प्रभावित हो सकती है। साथ ही करीब 90 लाख लोगों के गरीबी में जाने का खतरा भी बढ़ गया है।
स्थिति को और गंभीर बना रहा है होर्मुज जलडमरूमध्य में व्यवधान, जो वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का एक प्रमुख मार्ग है। एशिया, जो मध्य पूर्व के तेल और गैस पर काफी निर्भर है, इस संकट से सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहा है।
तेल की बढ़ती कीमतों के कारण आर्थिक विकास धीमा पड़ रहा है और देशों के बजट पर दबाव बढ़ रहा है। कई सरकारें वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की तलाश कर रही हैं, लेकिन यह प्रक्रिया महंगी और सीमित साबित हो रही है।
विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि अगर यह स्थिति लंबी चली, तो वैश्विक खाद्य संकट की संभावना भी बढ़ सकती है, क्योंकि उर्वरक और कृषि आपूर्ति श्रृंखलाएं ऊर्जा बाजार से जुड़ी होती हैं।
बढ़ती महंगाई, घटती खरीद क्षमता और व्यापार में अनिश्चितता से आम लोगों और व्यवसायों पर अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है। अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों ने भी वैश्विक विकास दर में गिरावट की आशंका जताई है।
यह संकट दिखाता है कि ईरान युद्ध के प्रभाव केवल क्षेत्र तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ रहा है, जिसमें एशिया सबसे ज्यादा प्रभावित क्षेत्रों में से एक बनकर उभर रहा है।