नई दिल्ली: वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में लगातार उछाल देखने को मिल रहा है। मंगलवार को ब्रेंट क्रूड की कीमत 84 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई। इसकी सबसे बड़ी वजह पश्चिम एशिया में बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के आसपास बढ़ी सैन्य गतिविधियां मानी जा रही हैं। हर नए घटनाक्रम के साथ तेल बाजार में अनिश्चितता बढ़ रही है और निवेशकों की चिंता भी गहराती जा रही है।
दुनिया के सबसे अहम तेल आपूर्ति मार्गों में शामिल होर्मुज जलडमरूमध्य से प्रतिदिन लाखों बैरल कच्चे तेल की ढुलाई होती है। ऐसे में इस क्षेत्र में किसी भी तरह के सैन्य तनाव, हमले या शिपिंग में बाधा की आशंका का सीधा असर अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों पर पड़ता है। बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका के चलते ट्रेडर्स लगातार खरीदारी कर रहे हैं, जिससे कीमतों में तेजी बनी हुई है।
विशेषज्ञों के अनुसार, यदि क्षेत्र में तनाव और बढ़ता है या तेल टैंकरों की आवाजाही प्रभावित होती है, तो कच्चे तेल की कीमतें 85 से 90 डॉलर प्रति बैरल या उससे ऊपर भी जा सकती हैं। वहीं, हालात सामान्य होने पर बाजार में कुछ राहत मिल सकती है।
कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों का असर भारत जैसे आयात-निर्भर देशों पर भी पड़ सकता है। यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेजी लंबे समय तक बनी रहती है, तो पेट्रोल-डीजल की लागत, परिवहन खर्च और महंगाई पर दबाव बढ़ने की आशंका रहेगी। हालांकि घरेलू ईंधन की कीमतों में बदलाव का फैसला तेल कंपनियां और सरकार कई अन्य आर्थिक कारकों को ध्यान में रखकर करती हैं।
फिलहाल पूरी दुनिया की नजर होर्मुज जलडमरूमध्य की स्थिति और पश्चिम एशिया में जारी घटनाक्रम पर टिकी हुई है। आने वाले दिनों में क्षेत्रीय तनाव किस दिशा में जाता है, उसी पर कच्चे तेल की कीमतों और वैश्विक बाजार की चाल काफी हद तक निर्भर करेगी।