पासपोर्ट को लेकर हाल ही में सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस के बीच केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया है कि मोदी सरकार ने इस विषय में कोई नया नियम लागू नहीं किया है। सरकार का कहना है कि पासपोर्ट को नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं माना जाना भारतीय कानून में पहले से ही स्थापित व्यवस्था है।
पासपोर्ट अधिनियम, 1967 के अनुसार केंद्र सरकार को विशेष परिस्थितियों में किसी गैर-नागरिक या विदेशी व्यक्ति को भी पासपोर्ट अथवा अन्य यात्रा दस्तावेज जारी करने का अधिकार प्राप्त है। इसी कारण केवल पासपोर्ट के आधार पर किसी व्यक्ति की भारतीय नागरिकता का अंतिम निर्णय नहीं किया जा सकता।
सरकार ने बताया कि भारत में नागरिकता का निर्धारण नागरिकता अधिनियम, 1955 और उससे संबंधित नियमों के तहत किया जाता है। पासपोर्ट एक महत्वपूर्ण पहचान और यात्रा दस्तावेज है, लेकिन नागरिकता की पुष्टि कानूनी प्रावधानों और निर्धारित प्रमाणों के आधार पर होती है।
यह मुद्दा उस समय चर्चा में आया जब पासपोर्ट सेवा दिवस के अवसर पर विदेश मंत्रालय के अधिकारियों ने कहा कि पासपोर्ट मुख्य रूप से एक यात्रा दस्तावेज है, नागरिकता का प्रमाण पत्र नहीं। इस बयान के बाद राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर बहस शुरू हो गई।
सरकार ने यह भी याद दिलाया कि भारतीय अदालतें कई बार स्पष्ट कर चुकी हैं कि नागरिकता का निर्धारण नागरिकता अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार किया जाएगा। वर्ष 2013 में बॉम्बे हाई कोर्ट ने भी अपने एक फैसले में कहा था कि किसी व्यक्ति की नागरिकता का फैसला केवल पासपोर्ट जैसे एक दस्तावेज के आधार पर नहीं किया जा सकता।
सरकारी पक्ष के अनुसार नागरिकता साबित करने के लिए जन्म से जुड़े दस्तावेज, नागरिकता कानून के तहत उपलब्ध रिकॉर्ड और अन्य वैध प्रमाणों को देखा जाता है। इसलिए पासपोर्ट को महत्वपूर्ण दस्तावेज माना जाता है, लेकिन यह नागरिकता का अंतिम और निर्णायक प्रमाण नहीं है।
इस मुद्दे पर विभिन्न राजनीतिक दलों, कानूनी विशेषज्ञों और सार्वजनिक हस्तियों ने अलग-अलग राय व्यक्त की है। कुछ नेताओं ने नागरिकता के प्रमाण को लेकर सवाल उठाए हैं, जबकि सरकार का कहना है कि वह केवल लंबे समय से चली आ रही कानूनी स्थिति को दोहरा रही है।