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बिहार में कांग्रेस ने तैयार की सीट शेयरिंग रणनीति, सीमांचल की 16 सीटों पर कोई समझौता नहीं

 कांग्रेस ने बिहार में सीट शेयरिंग का फॉर्मूला तय किया, सीमांचल में कोई समझौता नहीं

 
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के लिए कांग्रेस ने अपनी रणनीति को अंतिम रूप दे दिया है। राहुल गांधी की ‘वोट अधिकार यात्रा’ की सफलता के बाद कांग्रेस ने सीट शेयरिंग के मामले में अपना फोकस जीत पर रखा है और खासतौर पर मुस्लिम-दलित समीकरण वाली सीटों पर चुनाव लड़ने का मन बनाया है। इस बार कांग्रेस 70 सीटों के बजाय 55 से 60 सीटों पर चुनाव लड़ेगी, लेकिन यह संख्या केवल उन सीटों तक सीमित होगी जहां उसे जीत की अच्छी संभावना हो। कांग्रेस ने सीमांचल क्षेत्र की 16 मुस्लिम बहुल सीटों पर समझौता न करने का स्पष्ट संदेश दे दिया है जहाँ पार्टी अकेले चुनाव लड़ने के मूड में है।
 
दिल्ली में बिहार कांग्रेस नेताओं और पार्टी हाईकमान की बैठक में सीटों की सूची तैयार की गई है, जिसे राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे को सौंपा गया है। बिहार कांग्रेस प्रभारी कृष्णा अल्लावरू ने कहा है कि गठबंधन में नए साथी आए हैं, इसलिए सभी को समझौता करना होगा, लेकिन कांग्रेस इस बार नंबर गेम में फंसने के बजाय केवल जीतने वाली सीटों पर ही दावा ठोकना चाहती है। 2020 के चुनाव में कांग्रेस को मिली 70 सीटों में से अधिकांश पर उसे हार का सामना करना पड़ा था, इसलिए इस बार रणनीति को ‘क्वालिटी ओवर क्वांटिटी’ पर केंद्रित किया गया है।
 
सीमांचल क्षेत्र में कांग्रेस के चारमें से तीन सांसद होने के कारण पार्टी खुद को इस क्षेत्र में मजबूत मानती है और इसमें राजनीतिक वर्चस्व बनाये रखने की योजना है। यही वजह है कि कांग्रेस सीमांचल की 26 सीटों में से 16 सीट पर चुनाव लड़ने का जज्बा रखती है और वहां कोई समझौता नहीं करेगी।
 
कांग्रेस ने गठबंधन में सीटों की संख्या कम करने का मन बना लिया है, लेकिन इसके लिए विनिंग फॉर्मूले वाली सीटें जरूरी हैं। कांग्रेस का मानना है कि उसके लिए सीटों की संख्या से ज्यादा महत्वपूर्ण जीत का प्रतिशत है। शनिवार तक सीट शेयरिंग पर अंतिम फैसला होने की उम्मीद है।
 
हालांकि, आरजेडी के साथ सीट शेयरिंग को लेकर अब भी कुछ असमंजस बना हुआ है क्योंकि आरजेडी परंपरागत रूप से मुस्लिम-यादव समीकरण को मजबूत मानती है। दोनों पार्टियों के बीच सीमांचल और अन्य सीटों को लेकर बातचीत जारी है, पर कांग्रेस की ऐसी स्थिति दिख रही है कि यदि सही सीटें न मिलीं तो वह अकेले चुनाव लड़ने को भी तैयार है।
 
कांग्रेस की ये रणनीति साफ करती है कि वह अब ‘विनिंग सीट्स’ यानी जीत की सशक्त संभावना वाली सीटों पर ही चुनाव लड़ना पसंद करेगी और सीटों के नंबर से ज्यादा पार्टी की जीत पर ध्यान केन्द्रित रहेगा। इस बार कांग्रेस ने सियासी समझौते में लचीलापन दिखाया है लेकिन संख्या के बजाय गुणवत्ता पर जोर दिया है ताकि महागठबंधन चुनाव में प्रभावशाली प्रदर्शन कर सके।